Friday, September 04, 2015

ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

आपने कुछ जो कह दिया होगा
ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

बात फिर इश्क़ की चली होगी
फिर रक़ाबत का सिलसिला होगा

मैंने सोचा तो नहीं था हरगिज़
दिल के लुटने का हादिसा होगा

गो मैं छू भी नहीं सकूँ फिर भी
चाँद तो छत पे आ गया होगा

जल रहे आज जो रक़ीब मेरे
नाम उसने मेरा लिया होगा

लाख मुझसे हिज़ाब कर ले वो
आईने से न कुछ छुपा होगा

दिल लुटाने का ढब नहीं अब तक
इश्क़बाज़ी में वह नया होगा

ताब उसके शबाब का ग़ाफ़िल
आईना ख़ाक सह सका होगा

-‘ग़ाफ़िल’

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (06-09-2015) को "मुझे चिंता या भीख की आवश्यकता नहीं-मैं शिक्षक हूँ " (चर्चा अंक-2090) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी तथा शिक्षक-दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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