फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

गुरुवार, दिसंबर 29, 2016

कोई नहीं है यूँ जो तुम्हें आदमी बना दे

मतलब नहीं है इससे अब यार मुझको क्या दे
है बात हौसिले की वह दर्द या दवा दे

है रास्ता ज़ुदा तो मैं अपने रास्ते हूँ
उनके भी रास्ते का कोई उन्हें पता दे

ख़ूने जिगर की मेरी अब ऐसी क्या ज़ुरूरत
तुमको पड़ी है जो तुम कहते हो कोई ला दे

हो किस मुग़ालते में याँ यह भरम न पालो
कोई नहीं है यूँ जो तुम्हें आदमी बना दे

माना न जाएगा यह उसका क़ुसूर ग़ाफ़िल
कोई अगर तुम्हारा जी बुझ चुका जला दे

-‘ग़ाफ़िल’

तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

न तू बोलेगा तुझको क्या पुराना याद आता है
तो ले मुझसे ही सुन ले मुझको क्या क्या याद आता है

मुझे तो, रंग में आकर तेरा वह ग़ुस्लख़ाने में
फटे से बाँस जैसा सुर मिलाना, याद आता है

जब अपने सह्न की यारो मुझे है घास छिलवानी
तो अब वह घसछुला बेगार वाला याद आता है

कहीं अब मौज़ में आकर लुगाई से न कह देना
के तू मारी थी जो पहला तमाचा याद आता है

तेरी तो तू कहे ग़ाफ़िल मुझे तो अब शबे हिज़्राँ
न कोई और बस इक तू लड़ाका याद आता है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, दिसंबर 28, 2016

बात हो जाए अब आर या पार की

जी में सूरत उभर आई फिर यार की
इस क़दर कोई पाज़ेब झंकार की

हुस्न के शह्र में मैं भटक जाता पर
याद उसकी हमेशा ख़बरदार की

हूँ मैं हैरान आई कहाँ से भला
ख़ासियत हुस्न में सिप्हसालार की

बेरुख़ी हुस्न वालों की फ़ित्रत है जब
ख़ाक लेंगे ख़बर अपने बीमार की

कर चुका मैं बहुत इंतिज़ार इश्क़ में
बात हो जाए अब आर या पार की

था न मालूम उड़ जाएँगी धज्जियाँ
अंजुमन में तेरी मेरे अश्आर की

है ख़ुशी का न ग़ाफ़िल ठिकाना मेरे
आज पहली दफ़ा उसने तक़रार की

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, दिसंबर 27, 2016

ख़ूबसूरत शै को अक़्सर देखिए

मेरा दिल है आपका घर देखिए
जी न चाहे फिर भी आकर देखिए

आप हैं, मैं हूँ, नहीं कोई है और
क्या मज़ा है ऐसे भी गर देखिए

देखते रहने से बढ़ जाती है शान
ख़ूबसूरत शै को अक़्सर देखिए

मेरी तो हर ख़ामियाँ बतला दीं, अब
वक़्त हो तो ख़ुद के अन्दर देखिए

मैं दिखाता हूँ अब अपना हौसला
जैसा देखा उससे बेहतर देखिए

हुस्न बेपर्दा हुआ तो लुत्फ़ क्या
नीम पर्दा उसके तेवर देखिए

माना ग़ाफ़िल लौटकर आएँगे आप
रस्म है, फिर भी पलटकर देखिए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, दिसंबर 26, 2016

राहे उल्फ़त पे वो ग़ाफ़िल जी! मगर जाते हैं

देखा करता हूँ उन्हें शामो सहर जाते हैं
पर न पूछूँगा के किस यार के घर जाते हैं

मैं हज़ारों में भी तन्हा जो रहा करता हूँ
वे ही बाइस हैं मगर वे ही मुकर जाते हैं

है हक़ीक़त के कभी वे तो मेरे हो न सके
चश्म गो मैं हूँ बिछाता वे जिधर जाते हैं

आईना साथ लिए रहता हूँ मैं इस भी सबब
लोग कहते हैं वे शीशे में उतर जाते हैं

आह! डर जाने की फ़ित्रत न गयी उनकी अभी
देखते क्या हैं जो वे ख़्वाब में डर जाते हैं

बारिशे रह्मते रब में हैं अगर भीग गये
ज़िश्तरू भी तो यहाँ यार सँवर जाते हैं

वैसे आता ही नहीं इश्क़ निभाना उनको
राहे उल्फ़त पे वे ग़ाफ़िल जी! मगर जाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, दिसंबर 25, 2016

जो जलाने आ गए अपनों के ही साए मुझे

हुस्न के अरजाल में क्या वे फँसा पाए मुझे
गो के कबका हो चुका है इस तरफ़ आए मुझे

फलसफा-ए-इश्क़ ख़ुद जिसको समझ आया नहीं
है सवाल अब यह के वह किस तर्ह समझाए मुझे

काश! जी की ज़ुर्रतों में यह भी हो जाए शुमार
आईना बनकर वो अपने रू-ब-रू लाए मुझे

झेलना क्या कम था मेरा यार ताबानी-ए-शम्स
जो जलाने आ गए अपनों के ही साए मुझे

देखिए ग़ाफ़िल जी! गोया लुट चुका जी का चमन
दे रहे लेकिन तसल्ली फूल मुरझाए मुझे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, दिसंबर 17, 2016

होगा आगे जो भी देखा जाएगा

उठके जब मेरा जनाज़ा जाएगा
है यक़ीं इतना के तू आ जाएगा

बह्र से मिलने अब आगे देखिए
दर्या जाएगा के सोता जाएगा

कर दो बस साबित के उल्फ़त है गुनाह
फिर तो उसका लुत्फ़ बढ़ता जाएगा

राम जाने क्या हुआ जी को मेरे
दर से तेरे ही आवारा जाएगा

आप ग़ाफ़िल जी लिखे जाओ अश्आर
होगा आगे जो भी देखा जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, दिसंबर 10, 2016

सब हमारा ही नाम लेते हैं

जामे लब शब् तमाम लेते हैं
लेकिन उल्फ़त के नाम लेते हैं

दिल पे तीरे नज़र चलाके ग़ज़ब
आप भी इंतकाम लेते हैं

ज़िक़्रे आशिक़ अगर हो महफ़िल में
सब हमारा ही नाम लेते हैं

था न मालूम इश्क़ में बेगार
आप भी सुब्हो शाम लेते हैं

काढ़ा-ए-दीद, हम मुहब्बत का
जब भी होता जुक़ाम, लेते हैं

इश्क़ हमने किया है पर टेंशन
याँ क्यूँ हर ख़ासो आम लेते हैं

छूट जाए मजाल क्या ग़ाफ़िल
हम कलाई जो थाम लेते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, दिसंबर 08, 2016

तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है

गो आदत न थी डूबने की मेरी पर
तेरी आँख में डूब जाना पड़ा है
गया मैं सहर को अगर तेरे दर से
मुझे शाम तक लौट आना पड़ा है

-‘ग़ाफ़िल’


बुधवार, दिसंबर 07, 2016

अब सवाले इश्क़ पर तू हाँ कहेगा या नहीं

पेचो ख़म बातों का, तेरी ज़ुल्फ़ों सा सुलझा नहीं
अब सवाले इश्क़ पर तू हाँ कहेगा या नहीं

मेरी उल्फ़त की उड़ाई जा रही हैं धज्जियाँ
यह तमाशा क्या मेरे मौला तुझे दिखता नहीं

है वज़ूद इस आईने का अब तलक जो बरक़रार
शायद इसके रूबरू आया कोई तुझसा नहीं

मुस्कुराना ही फ़क़त है बाँटना खुशियाँ तमाम
मुस्कुराकर देख तेरा कुछ भी जाएगा नहीं

लोग कुछ मेरे लिए पाले हुए हैं यह फ़ितूर
कहने को ग़ाफ़िल है पर है वाक़ई ऐसा नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, दिसंबर 05, 2016

किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

भले दिन रात हरचाता बहुत है
मगर मुझको तो वह प्यारा बहुत है

वो हँसता है बहुत पर बाद उसके
ख़ुदा जाने क्यूँ पछताता बहुत है

जुड़ा है साथ काँटा जिस किसी के
उसी गुल का यहाँ रुत्बा बहुत है

मैं जगता रोज़ो शब हूँ इसलिए भी
के वक़्ते आखि़री सोना बहुत है

अगर ख़ुद्दार है तो डूबने को
सुना हूँ आब इक लोटा बहुत है

है राह आसान रुस्वाई की सो अब
उसी पर आदमी चलता बहुत है

न हो पाया भले इक शे’र तो क्या
किसी ग़ाफ़िल का यूँ जगना बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, नवंबर 28, 2016

वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

बात क्या है के बना प्यार जताने वाला
घाव सीने में कभी था जो लगाने वाला

अब मेरे दिल में जो आता है चला जाता है क्यूँ
काश जाता न कभी याँ से हर आने वाला

ख़्वाब तो देखा मगर उसको न देखा मैं कभी
हाँ वही शख़्स था जो ख़्वाब दिखाने वाला

उसका चोरी से भी दीदार कहाँ मुम्क़िन है
जब हुआ ख़ुद का ही दिल शोर मचाने वाला

इश्क़ आतिश है मगर फिर भी नहीं उज़्र मुझे
है जो शोला ही उस आतिश पे चलाने वाला

जिसको जाना था गया पल को भी ठहरा न भले
चश्म से जाता रहा अश्क बहाने वाला

यार ग़ाफ़िल हो सँभलना तो सँभल जा अब भी
वक़्त गुज़रा तो नहीं लौट कर आने वाला

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 24, 2016

सोचता हूँ तो है मुद्दआ कुछ नहीं

वस्ल का हिज़्र का सिलसिला कुछ नहीं
या के जी में तेरे था हुआ कुछ नहीं

लोग पाए हैं तुझसे बहुत कुछ अगर
तो मुझे भी मिला देख क्या कुछ नहीं

आदमी आदमी से परीशाँ है, क्या
आदमी आदमी का भला कुछ नहीं!

हाले दिल कह न पाया किसी तर्ह तो
कह दिया बस के जी! माज़रा कुछ नहीं

चाहता हूँ मैं लड़ता रहूँ यार से
सोचता हूँ तो है मुद्दआ कुछ नहीं

आईने की शिक़ायत भला क्यूँ मिंयाँ?
वह दिखाता है बस, देखता कुछ नहीं

फिर भी ग़ाफ़िल है रुस्वा हुआ इश्क़ में
जबके सब मानते हैं ख़ता कुछ नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 20, 2016

तू भी इल्ज़ाम लगाना तो ख़बर कर देना

जब तसव्वुर से हो जाना तो ख़बर कर देना
या के मुझको हो भुलाना तो ख़बर कर देना

देखकर नाज़ो अदा तेरी, है मुम्क़िन जो बहुत,
गर हो ग़ुस्ताख़ ज़माना तो ख़बर कर देना

वैसे इन्कार हमेशा मैं किया करता हूँ
पर अगर पीना पिलाना तो ख़बर कर देना

मुझको चोरी से मेरे दोस्त इत्तेफ़ाक़ नहीं
जी करे जी को चुराना तो ख़बर कर देना

नाम है फिर भी मगर, रक़्बा-ए-दिल पर मेरे
जब भी क़ब्ज़ा हो जमाना तो ख़बर कर देना

हो जो मालूम तो सज धज लूँ ज़रा मैं भी सनम
अब कोई रात हो आना तो ख़बर कर देना

जी तेरा जब भी भटक जाए रहे उल्फ़त में
और पाए न ठिकाना तो ख़बर कर देना

राज़ हो जाए कभी फ़ाश मिलन का अपने
तुझको सूझे न बहाना तो ख़बर कर देना

जी चुराने के मुक़दमें हैं कई ग़ाफ़िल पर
तू भी इल्ज़ाम लगाना तो ख़बर कर देना

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, नवंबर 19, 2016

ज़माने तेरी मिह्रबानी नहीं हूँ

शजर हूँ, तिही इत्रदानी नहीं हूँ
चमन का हूँ गुल मर्तबानी नहीं हूँ

ख़रा हूँ कभी भी मुझे आज़मा लो
उतर जाने वाला मैं पानी नहीं हूँ

ग़ज़ल हूँ, वही जो लबों पर है सबके
किताबों में खोई कहानी नहीं हूँ

मुझे याद रखना है आसान यूँ भी
हक़ीक़त हूँ झूठी बयानी नहीं हूँ

मैं ग़ाफ़िल भी हूँ तो हूँ फ़ित्रत से अपनी
ज़माने तेरी मिह्रबानी नहीं हूँ

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 16, 2016

किनारा था मैं बौराई नदी का

थे मेरे होंट आरिज़ था किसी का
दबी आवाज़ भी आई के ई का?

अभी आए हुए दो पल न बीते
भरोसा ख़ाक दूँ इक ज़िन्दगी का

है बाबत जिसके उस नाज़ुक जिगर को
बता दूँ क्या है ख़स्ता हाल जी का

गुनाहे यार भी क्या क्या गिनाऊँ
मैं शाइर हूँ मगर है शह उसी का

अचनाक मौत पर मेरे न ग़म कर
किनारा था मैं बौराई नदी का

कभी रुख़सार तो ला पास मेरे
मज़ा पा जाएगा तश्नालबी का

तेरे लिखने का मानी कुछ न ग़ाफ़िल
न हो पाए वो गर बाइस ख़ुशी का

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, नवंबर 11, 2016

वह राबिता भी क्या न जहाँ दिल्लगी रहे

क्या लुत्फ़ हो के तू जूँ उफनती नदी रहे,
डूबूँ मैं तुझमें, साथ मेरी तिश्नगी रहे

मौला करे लगे न किसी की नज़र कभी
ज़ीनत-ए-रू-ए-जाना हमेशा बनी रहे

यूँ भी न पेश आए के पूरा गँवा दूँ होश
लेकिन तू यह करे के ज़रा बेख़ुदी रहे

माना के दिल्लगी से ज़रर भी हुआ, मगर
वह राबिता भी क्या न जहाँ दिल्लगी रहे

क्यूँ बन सँवर के ख़ुद को सयाना दिखा रहा
ग़ाफ़िल रहा है और तू अब भी वही रहे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 03, 2016

शाइरी काफ़ी नहीं सूरत बदलने के लिए

मंज़िले उल्फ़त तो है अरमाँ पिघलने के लिए
है नहीं गर कुछ तो बस इक राह चलने के लिए

बन्द कर आँखें इसी उम्मीद में बैठा हूँ मैं
कोई तो जज़्बा मचल उट्ठे निकलने के लिए

हैं हज़ारों लोग तो सूरज पे ही इल्ज़ाम क्यूँ
ख़ाक करने को ज़हाँ आतिश उगलने के लिए

ये ज़ुरूरी है के हो उम्दा ख़यालों पर अमल
शाइरी काफ़ी नहीं सूरत बदलने के लिए

और कितनी लानतें ग़ाफ़िल पे भेजी जाएँगी
आतिशे उल्फ़त में उसके यार जलने के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 02, 2016

लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

क़शिश तो है इसमें है यह सिरफिरी, पर
लगी आज तुह्मत मेरी दोस्ती पर

ये मंज़र तस्सवुर में लाकर तो देखो
के हो चाँद तो, गुम सी हो चाँदनी, पर

लिया गर है जी आदमी आदमी का
लुटाया भी जी आदमी आदमी पर

समझ में न आएँ गो अश्आर मेरे
तुझे तो यक़ीं हो के हैं क़ीमती, पर

ये क्या है के कहता है नफ़्रत है तुझसे,
मज़ा भी है आता तेरी बेतुकी पर

हर इक बज़्म में लोग अश्आर मुझसे
ही पढ़वा रहे आज तक आख़िरी पर

कहीं सोचकर यह के ग़ाफ़िल लिखा क्या
पटक दे न सर तू मेरी इस लिखी पर

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 30, 2016

शुभ दीवाली

आओ अपने अंतस का तम दूर भगाएं
मृत्युस्पर्द्धी सोई मनुता पुनः जगाएं
अधिक नहीं इस तरह से दीपक एक जलाकर
यारों क्यों न अबकी दीपावली मनाएं

सपरिवार आप सभी को दीवाली की अनन्त हार्दिक शुभकामनाएँ

-‘ग़ाफ़िल’



बुधवार, अक्तूबर 26, 2016

क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

इश्क़ तो यारो मुझे मँहगा पड़ा
वक़्ते वस्लत मैं जो पीकर था पड़ा

देख उसको, क्या हुआ इक चश्म ख़म
क्या कहें किस दर्ज़े का चाटा पड़ा

भूत का मैंने लिया जैसे ही नाम
वह मुआ सूरत में उसकी आ पड़ा

कोई बावर्ची नहीं थे जबके वे
नाम फिर भी मुल्ला दो प्याज़ा पड़ा

था परीशाँ रूसियों से इसलिए
सर जो मुड़वाया तभी ओला पड़ा

चाहता ग़ाफ़िल हूँ शिद्दत से तो, पर
क्यूँ नहीं दिल पर मेरे डाका पड़ा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 22, 2016

हुस्न के शह्र में आ गए हो मियाँ

आ रहीं यूँ जो बेताब सी आँधियाँ
शर्तिया है निशाना मेरा आशियाँ

मैंने देखा है झुरमुट में इक साँप है
और हैं बेख़बर सारी मुर्गाबियाँ

मान लूँ क्या के अब दस्तो पा थक चुके
ग़ुम हुईं जो तेरी यार नादानियाँ

भूल जाओगे अब दीनो ईमान सब
हुस्न के शह्र में आ गए हो मियाँ

ज़ीनते ज़िन्दगानी है इतनी ही तो
तेरा करना मुआफ़ और मेरी ग़ल्तियाँ

बाकमाल ऐसी फ़ित्रत को क्या नाम दूँ
प्यार कुत्ते को इंसान को गालियाँ

यार ग़ाफ़िल ज़ुरूरी मुहब्बत है जूँ
क्या ज़ुरूरी हैं वैसे ही रुस्वाइयाँ?

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2016

गया जो देखकर इक बार चारागर, नहीं लौटा

किसी दिल के दरीचे से कोई जाकर नहीं लौटा
जूँ निकला अश्क राहे चश्म से बाहर, नहीं लौटा

वो क़ासिद, जो भी मेरा ख़त गया लेकर तेरी जानिब
न कोई बात है तो यार! क्यूँ अक्सर नहीं लौटा

मेरा दिल चंद पल तफ़रीह को तुझ तक गया था पर
न जाने क्यूँ वो आवारा अभी तक घर नहीं लौटा

बड़ी है तीरगी ठहरो मशाले जज़्बा ले आऊँ
यही कहकर गया लेकिन मेरा रहबर नहीं लौटा

बड़ी नाज़ुक है शायद मुझ मरीज़े इश्क़ की हालत
गया जो देखकर इक बार चारागर, नहीं लौटा

नहीं वाज़िब है अपने दिल पे भी करना यक़ीं ग़ाफ़िल
करोगे क्या बताकर ही गया पर गर नहीं लौटा

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 20, 2016

एक अदना दिल तो था लेकिन मुझे टूटा लगा

अब वही बेहतर बताएगा के उसको क्या लगा
इश्क़ में नुक़्सान मेरा पर मुझे अच्छा लगा

यूँ शिकन आई जबीं पर उसके, मुझको देखकर
वह मुझे फ़िलवक़्त मेरे दर्द का हिस्सा लगा

मैं उसे देता भी क्या था सामने मेरे सवाल
एक अदना दिल तो था लेकिन मुझे टूटा लगा

ख़ुश्बू-ए-बादे सबा क्यूँ जानी पहचानी है आज
सोचता मैं यह, के वह मेरे गले से आ लगा

आस्माँ के चाँद की मेरी तलब जाती रही
क्या कहूँ मैं रू किसी का चाँद के जैसा लगा

इल्म भी है क्या किसी को यह, के इस ग़ाफ़िल का भी
ज़ीनते महफ़िल की ख़ातिर, जोर जो भी था, लगा

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 18, 2016

भला क्यूँ लोग ऐसे बोलते हैं

हैं उनके होंठ चुप, वे बोलते हैं
न यह पूछो के कैसे बोलते हैं

नहीं सुन पाओगे तुम देख तो लो
इशारे किस तरह से बोलते हैं

मुहब्बत शै बुरी है बाज़ आओ
यूँ हर उल्फ़त के मारे बोलते हैं

विसाले शब, सुना है तुमने भी क्या
हो ख़ामोशी तो शिक़्वे बोलते हैं

जगाने के सबब लोगों को यारो!
कहाँ अब सुब्ह मुर्गे बोलते हैं

मिले उनको भी हाँ कहने का मौक़ा
नहीं ही जो बेचारे बोलते हैं

तू ग़ाफ़िल था, है, आगे भी रहेगा
भला क्यूँ लोग ऐसे बोलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 16, 2016

इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

है मेरा जो हाल ख़स्ता दोस्तो!
इश्क़ मैंने भी किया था दोस्तो!!

आज मेरे इश्क़ का हर एक राज़
सामने सबके खुलेगा दोस्तो!

लड़खड़ाते थे मेरे पा बिन पिए
इश्क़ में भी था नशा क्या, दोस्तो!

क्या जला, क्या रह गया, कैसे कहे
आतिशे उल्फ़त में डूबा, दोस्तो!

अब दिखा तूफ़ान बह्रे इश्क़ का
आ चुका तो था कभी का दोस्तो!

ज़ीस्त उसकी है जो कुछ सोचे बग़ैर
इश्क़ में डूबा सरापा दोस्तो!

देखिएगा लोग बोलेंगे ज़ुरूर
यह के ग़ाफ़िल याद आया दोस्तो!

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 13, 2016

जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

गो सर पे मेरे कोई था साया नहीं कभी
यह शम्स फिर भी मुझको सताया नहीं कभी

मेरा भी हक़ है तेरी इनायत पे ऐ ख़ुदा
पीता हूँ क्या इसीलिए पाया नहीं कभी

मालूम है के है ये गुनाहे अज़ीम, जो
बज़्मे क़दह में तुझको बुलाया नहीं कभी

ताउम्र हूँ मनाया मुहर्रम ही यार पर
भूले से भी वो गीत मैं गाया नहीं कभी

दुनिया फ़रेबियों से भरी है, तू कह रहा
पर तूने ख़ुद का नाम गिनाया नहीं कभी

उस ज़ख़्म का हो गर तो भला कैसे हो इलाज़
टीसे तो, पर जो होता नुमाया नहीं कभी

आतिशजनों को हो न परेशानी इस सबब
जी मैंने अपना पुख़्ता कराया नहीं कभी

दिल तोड़ना बस एक ही झटके में, जाने क्यूँ
ग़ाफ़िल को तूने यार सिखाया नहीं कभी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 10, 2016

कभी था जो अपना पराया हुआ है

बताए न किसका सताया हुआ है
मेरा दिल मगर चोट खाया हुआ है

यक़ीनन मुहब्बत का मारा है ये दिल
तभी चुप है बेहद लजाया हुआ है

उछलता फिरे है मेरा दिल ख़ुशी से
के उल्फ़त में ख़ुद को लुटाया हुआ है

ये दिल है के आवारा मौसम है कोई
कभी था जो अपना पराया हुआ है

दिलों को जो है जोड़ सकता वो नग़मा
भुलाया हुआ था भुलाया हुआ है

तेरे पास ग़ाफ़िल गो दिल है मेरा पर
कहूँ कैसे तेरा चुराया हुआ है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 08, 2016

मैं ख़ुश्बू हूँ बिखरना चाहता हूँ

तू जाने है के मरना चाहता हूँ?
मैं ख़ुश्बू हूँ बिखरना चाहता हूँ।।

अगर है इश्क़ आतिश से गुज़रना,
तो आतिश से गुज़रना चाहता हूँ।

सही जाए न ताबानी-ए-रुख़, पर
तेरा दीदार करना चाहता हूँ।

सरो सामान और अपना आईना दे!
मैं भी बनना सँवरना चाहता हूँ।

शराबे लब से मुँह मोड़ूं तो कैसे?
कहाँ पीना वगरना चाहता हूँ?

ऐ ग़ाफ़िल तेरा जादू बोले सर चढ़,
तेरे दिल में उतरना चाहता हूँ।।

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 05, 2016

मुझे क्यूँ तीरगी में रौशनी मालूम होती है

चले तू जब तो बलखाती नदी मालूम होती है
मुझे फिर जाने जाँ क्यूँ तिश्नगी मालूम होती है

तू मेरे सिम्त जब भी आ रही मालूम होती है
मेरे ज़ेह्नो जिगर में गुदगुदी मालूम होती है

है अंदाज़े बयाँ तेरा के है दीवानगी अपनी
तेरी झूठी कहानी भी सही मालूम होती है

चलो अच्छा हुआ मैंने नहीं जो इश्क़ फ़र्माया
कई फ़र्माए और इज़्ज़त गयी, मालूम होती है

जवाँ होने लगी शायद मेरी उल्फ़त मेरे जैसी
तेरी हर इक अदा अब क़ीमती मालूम होती है

हूँ शायद मैं नशे में या तेरे आने की है आहट
मुझे क्यूँ तीरगी में रौशनी मालूम होती है

न जाने हो गया है क्या सदी की नाज़नीनों को
के चुन्नी भी गले की, दार सी मालूम होती है

है सच भी या के है धोखा फ़क़त, मेरी नज़र का जो
तू मुझसे आजकल रूठी हुई मालूम होती है

मैं ग़ाफ़िल था, हूँ, आगे भी रहूँगा और क्या क्या क्या
मेरे बाबत ये सब, तेरी कही मालूम होती है

(दार=फाँसी)

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 29, 2016

तुह्मत तो लाजवाब मिले, होश में हूँ मैं

मुझको तो अब शराब मिले, होश में हूँ मैं
और वह भी बेहिसाब मिले, होश में हूँ मैं

सच्चाइयों से ऊब चुका हूँ बुरी तरह
अब इक हसीन ख़्वाब मिले, होश में हूँ मैं

मेरे किये का ख़ाक मिलेगा मुझे सवाब
तुह्मत तो लाजवाब मिले, होश में हूँ मैं

अर्ज़ी मेरी क़ुबूल हो उल्फ़त की आज ही
या तो मुझे जवाब मिले, होश में हूँ मैं

ग़ाफ़िल समझ के बात जुगनुओं पे टाल मत
अब मुझको माहताब मिले, होश में हूँ मैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 24, 2016

बड़ी मग़रूर किस्मत हो गई है

हमें जबसे मुहब्बत हो गई है
मुहब्बत भी सियासत हो गई है

चलो फिर इश्क़ में खाते हैं धोखा
हमें तो इसकी आदत हो गई है

गया चैनो सुक़ूँ यानी के सब कुछ
कहें भी क्या के उल्फ़त हो गई है

जिए जाते हैं फिर भी देखिए हम
गो बेग़ैरत सी ग़ैरत हो गई है

फ़क़त हमसे है पर्दा क्या समझ लूँ
किसी की हमपे नीयत हो गई है

तेरे जाने से उजड़े घोसले सी
हमारे दिल की हालत हो गई है

दुहाई बारहा देने से ग़ाफ़िल
बड़ी मग़रूर किस्मत हो गई है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 21, 2016

सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

तू मना कर दिया जाने क्या जानकर
सोचता था लिखूँ तुझको उन्वान कर

पा लिया मैं ख़ुशी उम्र भर की सनम
दो घड़ी ही भले तुझको मिह्मान कर

फिर रहे क्यूँ शिक़ायत, अगरचे मिले
आदमी आदमी को भी पहचान कर

मैं तुझे खोजता ही रहा तू मुझे
किस तरह एक दूजे का अनुमान कर

मैं चला जाऊँगा तेरे कूचे से तू
भूल जाना मुझे बेवफ़ा मान कर

मैं कहा तो था ग़ाफ़िल सुना तू कहाँ
यह के यूँ अपने दिल की न दूकान कर

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 15, 2016

या तो इस पार की या तो उस पार की

अब तलक जो हुई सब थी बेकार की
चाहिए बात हो अब ज़रा प्यार की

खिलके गुंचे भी तो हो गए फूल सब
ख़ूबसूरत घड़ी है ये इज़हार की

गर सुनाने लगा मैं कभी हाले दिल
बात चल जाएगी तुझसे तकरार की

हुस्न के तो क़सीदे पढ़े जा रहे
याद जाती रही इश्क़ के मार की

आह! रुस्वाइयाँ हो रहीं बारहा
उस मुहब्बत की जो मैंने इक बार की

जो भी होना है ग़ाफ़िल जी हो जाए अब
या तो इस पार की या तो उस पार की

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 14, 2016

मुझे ज़िन्दगी का नशा सा हुआ है

नहीं जानता तू के याँ क्या हुआ है
ग़ज़ब, तूने जो भी कहा था, हुआ है

फ़लक़ से यहाँ रात बरसी है आतिश
सहर कोहरे का तमाशा हुआ है

अरे अंदलीबों न बेफ़िक़्र रहना
ज़माना ही सय्याद जैसा हुआ है

तेरे सिम्त से लौट आया मेरा दिल
यही आज मेरा मुनाफ़ा हुआ है

भला क्यूँ सताए मुझे डर किसी का
क़फ़स यार मेरा भी झेला हुआ है

अजल रुक ज़रा, होश में आ तो जाऊँ
मुझे ज़िन्दगी का नशा सा हुआ है

तड़पता है ग़ाफ़िल वो उल्फ़त का भूखा
क़सम सैकड़ों जबके खाया हुआ है

(अंदलीब=बुलबुल, सय्याद=बहेलिया, सिम्त=तरफ़, क़फ़स=पिंजड़ा, अजल=मौत)

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 13, 2016

हुस्न कोई गर न टकराता कभी

तू बता मेरी तरफ देखा कभी
और देखा तो बुलाया क्या कभी

चाहेगा जब पास अपने पाएगा
क्या मुझे है ढूढना पड़ता कभी

तू नहीं करता परीशाँ गर मुझे
तो कहाँ होता कोई अपना कभी

ख़ाक बढ़ता प्यार का यह सिलसिला
हुस्न कोई गर न टकराता कभी

तिश्नगी, सैलाब मैंने एक साथ
आँख में अपने ही देखा था कभी

काश! जानिब से तेरी आती सदा
यूँ के ग़ाफ़िल अब यहाँ आजा कभी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 12, 2016

दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

जल रहीं जो याँ दिलों की बस्तियाँ
कब गिरीं इक साथ इतनी बिजलियाँ

बातियों में अब नहीं लज़्ज़त रही
अब बिगाड़ेंगी भला क्या आँधियाँ

अंजुमन भी किस तरह का अंजुमन
हों न गर तेरी मेरी सरगोशियाँ

जिस जगह भी मैं कभी आया गया
उस जगह कितनी हैं पहरेदारियाँ

गो के अब तक तो नहीं ऐसा हुआ
हैं बहुत ख़ामोश सी ख़ामोशियाँ

क्यूँ लुटा मैं दे रहीं इसका जवाब
किस अदा से आपकी बेताबियाँ

तब कहाँ थे आप मेरे ग़मग़ुसार
जब मुझे डंसती रहीं तन्हाइयाँ

निभ नहीं पाएँगी ग़ाफिल जी कभी
दरमियाँ अपने ये पर्देदारियाँ

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 10, 2016

मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

जला है जी मेरा और उसपे मुझसे ही शिक़ायत है
न कहना अब के ग़ाफ़िल यूँ ही तो होती मुहब्बत है

मुझे तो होश आ जाए कोई पानी छिड़क दे बस
तेरा होगा भला क्या तेरी तो रिन्दों की सुह्बत है

हुई है राह इक तो अब मुहब्बत हो ही जाएगी
अगर इंसानियत की जी को थोड़ी सी भी आदत है

नहीं मिलता कभी साहिल सफ़ीना-ए-मुहब्बत को
ख़ुदारा हुस्न के सागर में क्यूँ होती ये क़िल्लत है

कभी रंगीन दुनिया के मुझे सपने नहीं आते
मेरा सादा सा दिल है और सादी सी ही फ़ित्रत है

तू पैताने रक़ीबों के हूमेशा है नज़र आता
तेरी इस हुस्न की महफ़िल में क्या इतनी ही क़ीमत है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 29, 2016

क्या आँच दे सकेंगे बुझते हुए शरारे

गुल सूख जाए हर इक या ग़ुम हों चाँद तारे
गाएंगे लोग फिर भी याँ गीत प्यारे प्यारे

ऐ अब्र! है बरसना तो झूमकर बरस जा
है गर महज़ टहलना तो फिर यहाँ से जा रे!

गोया के आ रहे हैं अब तक सँभालते ही
पागल नदी को फिर भी दिखते नहीं किनारे

डालो अलाव में जी! कुछ और अब जलावन
क्या आँच दे सकेंगे बुझते हुए शरारे

तुर्रा है यह के उल्फ़त ख़ंजर की धार सी है
और उसपे रक्स को हैं बेताब लोग सारे

वह बेल इश्क़ वाली सरसब्ज़ क्या रहेगी
ग़ाफ़िल रहेे जो तेरे शाने के ही सहारे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 27, 2016

बवंडर

उठा है एक बवंडर जो आज सीने से
नहीं पता है के वह राह किस गुज़रता है
इन आँधियों का सफ़र देखना है ग़ाफ़िल अब
फ़क़त न घर ही, यहाँ क्या तबाह करता है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 16, 2016

सुनाने वो ग़ाफ़िल को ताने चले हैं

बताओ जी क्या क्या बनाने चले हैं
अदब के जो याँ कारख़ाने चले हैं

जो हों कानफाड़ू जँचें बस नज़र को
अब ऐसी ही ख़ूबी के गाने चले हैं

न जिनको हुनर है बजाने का ढोलक
सितम है वो हमको नचाने चले हैं

गया है बिखर टूटकर दिल हमारा
जनाब अब उसे आज़माने चले हैं

चले तो सही तीर नज़रों के उनके
भले मेरे दिल के बहाने चले हैं

नहीं रेंगता जूँ है कानों पे जिनके
सुनाने वो ग़ाफ़िल को ताने चले हैं

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 13, 2016

डर है के लुट न जाए यहाँ फिर कोई कभी

हो कुछ न और, फिर भी ये होके रहेगा यार
ले लेगी मेरी जान तेरी बेरुख़ी कभी
चर्चा नहीं करूँगा के मैं लुट गया, मगर
डर है के लुट न जाए यहाँ फिर कोई कभी

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 11, 2016

जो अपने थे कभी मुझको तो सारे याद रहते हैं

भले तुझको नहीं उल्फ़त के किस्‍से याद रहते हैं
मुझे हर बेमुरव्वत वक़्त गुज़रे, याद रहते हैं

कभी अपने नहीं थे जो उन्हें अब याद क्‍या करना
जो अपने थे कभी मुझको तो सारे याद रहते हैं

अगर भूला है तू कुछ तो मुहब्बत का सबक भूला
तुझे वैसे तो हर इक काम धन्धे याद रहते हैं

नहीं आता तुझे तारीफ़ का इक हर्फ़ भी लेकिन
ज़ख़ीरे के ज़ख़ीरे गालियों के याद रहते हैं

तबस्सुम ग़ैर के लब का जो भाये भी तो क्यूँ भाये
मुझे जब होंट तेरे मुस्कुराते याद रहते हैं

न कुछ भी याद आए पर न जाने क्यूँ मेरी ख़ातिर
तुझे ग़ाफ़िल ज़माने भर के फ़िक़रे याद रहते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 02, 2016

मुहब्बत का मेरे भी वास्ते पैग़ाम आया है

मिला चौनो क़रारो बेश्तर आराम आया है
सुना है जी चुराने में मेरा भी नाम आया है

न कोई राबिता था तब न कोई राबिता है अब
मगर फिर भी दीवाने याद तू हर गाम आया है

नहीं था इश्क़ तुझको गर तो फिर मेरे ही कूचे में
भला यह तो बता दे क्यूं तू सुब्हो शाम आया है

तू क्या जाने के मुझको भी ग़ुरूर अपना जलाना था
तेरा आतिश उगलना आज मेरे काम आया है

नहीं बेचैन करता अब ख़याले ज़िश्तरूई भी
मुहब्बत का मेरे भी वास्ते पैग़ाम आया है

अरे ग़ाफ़िल! भले जैसा भी हो इक बार मिल तो ले
के तेरे आस्ताँ पर फिर दिले नाकाम आया है

(ख़याले ज़िश्तरूई=बदसूरती का विचार)

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 30, 2016

मगर जाता है

क्यूँ बताता है नहीं दोस्त किधर जाता है
और जाता है तो किस यार के घर जाता है

पास आ मेरे सनम जा न कहीं आज की रात
या मुझे लेके चले साथ, जिधर जाता है

तू जो आ जाये है पल को ही तसव्वुर में सही
साँस रुक जाती है और वक़्त ठहर जाता है

हूक उट्ठे है वो शब वस्ल की याद आए है जब
एक ख़ंजर सा कलेजे में उतर जाता है

मैंने रोका तो बहुत तेरी तरफ़ जाने से
जी कहा भी के न जाऊँगा मगर जाता है

राज़ तो फ़ाश हो जाएगा ज़फ़ाई का तेरा
अब जनाज़े से मेरे उठके अगर जाता है

छोड़कर जाम मेरी मस्त नज़र का ग़ाफ़िल
आजकल दर से मेरे यूँ ही गुज़र जाता है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 28, 2016

भूल जाओ किसका आना रह गया

क्या बताऊँ? क्या बताना रह गया
सोचता बस यह, ज़माना रह गया

क्या यही चारागरी है चारागर!
जख़्म जो था, वो पुराना...! रह गया

लोग आए, शाम की, जाते बने
रह गया तो बादाख़ाना रह गया

इश्क़ में है जी जला फिर जिस्म भी
तू बता अब क्या जलाना रह गया

है कहाँ अब थी जो लज़्ज़त प्यार की
याद करने को फ़साना रह गया

आप ग़ाफ़िल जी लिखे जाओ अश्आर
भूल जाओ किसका आना रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 26, 2016

रात ही जब हुई मुख़्तसर

गो है आवारगी बेश्तर
हो गए शे’र अपने मगर

एक क़त्आ-

क्या गुमाँ नाज़नीनों को है
क्यूँ हैं घबराए हम इस क़दर
आई टोली है जब पील की
टूटते ही रहे हैं शजर

और तमाम अश्आर-

मेरे अरमाँ सहम से गये
डाली तूने है कैसी नज़र

तेरे आने की हो क्यूँ ख़ुशी
तेरे जाने की है जब ख़बर

रौशनी हो सकी क्या, ये दिल
जबके जलता रहा रात भर

राबिते की वज़ह भी तो है
रूठना तेरा हर बात पर

मक़्ताशुदा एक और क़त्आ-

मंज़िले इश्क़ सर हो तो क्यूँ
रात ही जब हुई मुख़्तसर
वरना तो इश्क़ फ़र्माने को
एक ग़ाफ़िल भी रक्खे जिगर

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जुलाई 25, 2016

बता फिर तेरी क़ीमत और क्या है

ख़रा तो हूँ अदावत और क्या है
तुझे मुझसे शिक़ायत और क्या है

है मेरे सर पे तेरा दस्त या रब!
भला मेरे लिए छत और क्या है

कहाँ अब तुझको मेरा ग़म सताए
न है यह तो फ़ज़ीहत और क्या है

चुकाया था तो पर ज़िद पे है अब तू
बता फिर तेरी क़ीमत और क्या है

चले हर सू से सर पे संग फिर यह
न उल्फ़त है तो उल्फ़त और क्या है

ग़नीमत है के सर तो है सलामत
इस उल्फ़त में सलामत और क्या है

इनायत है तेरी ऐ मेरे हमदम
ज़ियादा इससे राहत और क्या है

परीशाँ कर रहा मुझको तू ग़ाफ़िल
अलावा इसके आदत और क्या है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 20, 2016

लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

हो कभी तो वही अपनी ज़िल्लत भी हो
या ख़ुदा इश्क़ ही मेरी ताक़त भी हो

मंज़िले इश्क़ हासिल तो हो जाए गर
उससे इज़्हार की थोड़ी हिम्मत भी हो

है दगाबाज़ पर ग़ौर से देखिए
शायद उसमें ज़रा सी शराफ़त भी हो

यार तारीफ़ केवल उबाऊ लगे
लुत्फ़ आए जो थोड़ी फ़ज़ीहत भी हो

जी को राहत न हो तो भला आपकी
होके होना भी क्या गर इनायत भी हो

एक ‘ग़ाफ़िल’ को फिर और क्या चाहिए
जब दुआ हो, दवा हो, नसीहत भी हो

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 19, 2016

ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

अश्कों को रोकता हूँ मैं रुकते मगर नहीं
आतिश हैं वो के आब हैं उनको ख़बर नहीं

इस शह्र के हैं लोग अजब ही ख़याले ख़ाम
दुश्मन भी गर मिले तो मिले मातिबर नहीं

भड़केगी आग और हो जाएगा ख़ाक तू
आतिशजनी से होगा अलग अब भी गर नहीं

पूछें यही सभी के मिलोगे किधर जनाब
मैं कह रहा हूँ जबके मैं रहता किधर नहीं

आती नहीं है नींद के जैसे कहा हूँ मैं
जाना जिधर हो जाए पर आए इधर नहीं

ग़ाफ़िल भी चाहता है के आदत में हो शुमार
ये पा उधर बढ़ें न जिधर तेरा घर नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जुलाई 17, 2016

आवारा कर दिया शह्र की गलियों ने

कहता हूँ सावन की स्याह घटाओं ने
उलझाया पर मुझको तेरी ज़ुल्फ़ों ने

शह्र की गलियों में है जो अफ़रातफ़री
आज शैर की ठानी है दिलवालों ने

सकते में है बाग़बान करता भी क्या
साथ चमन के गद्दारी की फूलों ने

फ़ित्रत से मैं रहा घुमक्कड़ मुझे मगर
आवारा कर दिया शह्र की गलियों ने

आज बन गया जी का भर्ता बेमतलब
ऐसी ऐसी ग़ज़ल सुनाई लोगों ने

चल भी लेता बिना सहारे मैं ग़ाफ़िल
मगर बिगाड़ी आदत तेरे कन्धों ने

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 16, 2016

अक्स किसका मगर यार बनाता रहा

हिज़्र की आग में जी सुलगता रहा
और पूछे है तू हाल कैसा रहा!

गो लुटा मैं तेरे प्यार में ही मगर
देख तो हौसला प्यार करता रहा

धरपकड़ में मेरा, हुस्न और इश्क़ के
जिस्म छलनी हुआ, जी छलाता रहा

आईना था वही और मैं भी वही
अक्स किसका मगर यार बनता रहा?

ख़ार के रास्तों, हादिसों का शहर
तेरा, किस बात पे नाज़ करता रहा?

लाश अरमान की ग़ज़्ब ता’ज़िन्दगी
मैं ग़रीब अपने कन्धे पे ढोता रहा

इल्म ग़ाफ़िल तुझे इसका हो भी तो क्यूँ
इश्क़ में हिज़्र का ही तमाशा रहा

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 14, 2016

मगर सच में तू दम भरता नहीं है

कभी मुझसा कोई कहता नहीं है
मगर कोई मेरी सुनता नहीं है

हज़ारों हैं रहे उल्फ़त में लेकिन
कोई तुमसा मुझे जँचता नहीं है

अरे! तू मुस्कुरा लेता है कैसे
ये ग़ुस्ताख़ी कोई करता नहीं है

यूँ पर्दादारी भी क्या पर्दादारी
दुपट्टा अब तेरा उड़ता नहीं है

बड़े अफ़सोस की है बात अब तू
अदा-ए-शोख़ पर मरता नहीं है

है चर्चे में तेरी वादाखि़लाफ़ी
मगर तू शर्म से गड़ता नहीं है

मसन्निफ़ कम नहीं हैं आज यारो!
हक़ीक़त पर कोई लिखता नहीं है

तुझे मंज़िल तो मिल जाती ही ‘ग़ाफ़िल’
मगर सच में तू दम भरता नहीं है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 13, 2016

था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

थे कभी तुम भी ग़मग़ुसार ख़ुदा जाने क्यूँ
आज खाए हो तुम्हीं ख़ार ख़ुदा जाने क्यूँ

जल रहा इश्क़ में हूँ फिर भी लगी ये तुह्मत
मैं तुम्हारा हूँ गुनहगार, ख़ुदा जाने क्यूँ

जिस्म तो बिक ही गया रूह भी बिक जाती मगर
था नहीं कोई ख़रीदार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैंने तो लाख दुहाई दी चढ़ाई क़स्में
तुमसे माना न गया यार ख़ुदा जाने क्यूँ

तुमने भी क्या न सितम ढाया मेरे दिल पे मगर
मैं ही था करता रहा प्यार ख़ुदा जाने क्यूँ

मैं तो फ़ित्रत से हूँ ग़ाफ़िल ऐ तमन्ना-ए-इश्क़
आह! तुम भी तो गई हार ख़ुदा जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 12, 2016

हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

दिए क्या भला आज तक ज़िन्दगी को
लगाए नहीं तुम गले गर किसी को

नहीं रोक पाओगे ख़ुद को जो मेरी
तसव्वुर में लाओगे तश्नालबी को

दहल जाएगा दिल तुम्हारा भी बेशक
निहारोगे जब भी मेरी बेबसी को

न डूबा तो क्या लाश मुझको कहोगे
मैं हूँ तैरकर पार करता नदी को

किसी ने किया आज इज़्हारे उल्फ़त
कहूँ तो कहूँ क्या मैं इस दिल्लगी को

अरे यार ग़ाफ़िल न लौटेगी फिर क्या
हुआ एक अर्सा गए भी हँसी को

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जुलाई 09, 2016

रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

ठेस लग जाती है जिनको बस ज़रा सी बात से
कह रहे हैं वे के हम तो लड़ रहे हालात से

हम परीशाँ हैं के ढकने को बदन, कपड़े नहीं
ख़ुश हैं काफी लोग इज़्ज़त के भी इख़्राजात से

आप तो ऐसे न थे मैं भी हूँ इतना जानता
वज़्ह क्या है डर रहे जो आप मा’मूलात से

चाँद को रोटी बताऐं कम नहीं ऐसे भी लोग
यूँ भी बेहतर खेलते रहते हैं वो जज़्बात से

ताल-सुर और भाव-भाषा, बह्र तक ग़ायब हुई
रब मुझे बस दूर रक्खे आज के नग़्मात से

आप तो शाइर हो ग़ाफ़िल जी वग़ैरह कहिए मत
कोफ़्त होती है बहुत, कुछ ऐसे तंज़ीयात से

{इख़्राजात=व्यय, मा’मूलात= मा’मूल (रोज़मर्रा की सामान्य चर्या) का बहुवचन, तंज़ीयात= तंज़ (व्यंग्य) का बहुवचन}

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 07, 2016

जलाना है अगर कुछ तो ग़मे फ़ुर्क़त जला देना

समझ में कुछ नहीं आए मुझे वापस है क्या देना
मिला जो प्यार मुझको उसके बदले में, ...बता देना!

हैं मेरे पास तो धोख़े हज़ारों किस्म के फिर भी
बना है सिलसिला अब तक मेरा लेना तेरा देना

बुझाने के लिए मुद्दत की मेरी तिश्नगी है तो
जलाना है अगर कुछ तो ग़मे फ़ुर्क़त जला देना

निकल आएगी ही सूरत कोई उस तक पहुँचने की
अरे ओ दिलनशीं! ख़ुद के ज़रा दिल का पता देना

किसी ग़ाफ़िल को गरचे इश्क़ फ़र्माए कोई तो क्यूँ
बहुत आसान है आसान यह जुम्ला सुना देना

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जुलाई 03, 2016

ज़रा सोचता मुस्कुराने से पहले

वो आए किसी भी बहाने से पहले
उसे देखना है ठिकाने से पहले

बताओ भला इश्क़ की भी इजाज़त
अरे यार क्या लूँ ज़माने से पहले

चलाया वो तीरे नज़र और लगा भी
मगर हिचकिचाया चलाने से पहले

मेरी धडकनों के भी बावत सितमगर
ज़रा सोचता मुस्कुराने से पहले

कहाँ हौसला था उठाने का परबत
हसीनों के नख़रे उठाने से पहले

ज़रा झाँकना आईने में भी ग़ाफ़िल
मुझे इश्क़ में आज़माने से पहले

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 30, 2016

बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

रुस्वाई-ए-शहर का बहाना ज़ुरूर है
उसको तो मेरे सिम्त से जाना ज़ुरूर है

मुझको पता है जान! रक़ीबों के वास्ते
बज़्मे तरब में तुझको तो आना ज़ुरूर है

मैं इक निग़ाह डाल भी सकता नहीं हूँ गो
वह मेरे टूटे दिल का फ़साना ज़ुरूर है

आई न मेरी याद तुझे औ मैं आ गया
पहलू में तेरे शाम बिताना ज़ुरूर है

महफ़िल में छा गया है ग़ज़ब फिर भी किस तरह
ग़ाफ़िल का शे’र गोया पुराना ज़ुरूर है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जून 17, 2016

वाह री ज़िन्दगी

गोया है मिह्रबाँ आज भी ज़िन्दगी
पर कहाँ अब वो अपनी रही ज़िन्दगी

मैं था हैरान क्या हो रहा है यहाँ
और मुझसे रही खेलती ज़िन्दगी

मैं तवज़्ज़ो दिया उम्र भर बेश्तर
फिर रही क्यूँ कटी की कटी ज़िन्दगी

फ़ाइदा ग़ैर का और अपना ज़रर
तू किए जा रही वाह री ज़िन्दगी

अब तलक ख़ार चुभते चले आ रहे
फिर कहूँ क्यूँ के है रसभरी ज़िन्दगी

राह में थे हज़ारों मक़ाम उसके पर
एक की भी नहीं हो सकी ज़िन्दगी

आज गर है ख़िज़ाँ तो बहार आए कल
यह पता है तो क्या सोचती ज़िन्दगी

कह रहा हूँ के कर दे गिला दूर सब
क्या करेगी न फिर गर मिली ज़िन्दगी

जीतना था अजल को गई जीत पर
आख़िरी साँस तक है लड़ी ज़िन्दगी

सोचता ही रहा वक़्ते रुख़्सत मैं यह
एक ग़ाफ़िल की भी क्या रही ज़िन्दगी

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जून 15, 2016

क्या सचमुच होता ऐसा है

यारो दीवाना कोई जब ख़ुद पे आया है
होता इक इतिहास मुक़म्मल मैंने देखा है

वो चन्दा मामा भी अब मुझसे है रूठा सा
जो तब रोज़ कटोरा भर भर दूध पिलाया है

वैसे तो महफ़िल में होते हैं कुछ जूँ अपने
लेकिन मिलते ही नज़रें क्यूँ होता धोखा है

इश्क़ मुझे है तुमसे ऐसा भरम नहीं पालो
फ़ित्रत है इसकी जो ये दिल मचला करता है

हार चुके हो बाज़ी उल्फ़त की अब ज़िद कैसी
इन खेलों में यार कहाँ मिलता हर्ज़ाना है

मेरे अह्बाबों को मुझसे कुछ भी गिला नहीं
ग़ाफ़िल दुनिया में क्या सचमुच होता ऐसा है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 13, 2016

और क्या?

मंज़िले इश्क़ का है पता और क्या?
या बताओगे है रास्ता और क्या?

इस क़दर क्यूँ मियाँ आप हैरान हैं
बस ज़फ़ाई किया वह किया और क्या?

जब कहा वह के दिल से किया बेदख़ल
तो भला अब रखें राबिता और क्या?

हम थे मज़्बूर झक मारते ही रहे
मारने के लिए पास था और क्या?

दिल लुटा छोड़िए लुट गया आदतन
बोलिए है लुटा आपका और क्या?

दिल की चोरी का ही ये न कोहराम है
फिर कहे तो कोई के हुआ और क्या?

आपके तंज़ ग़ाफ़िल जी क्या कम थे जो
आप चुप हो गए, हैं ख़फ़ा और क्या?

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जून 12, 2016

पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

लिख रहा हूँ मैं ग़ज़ल शामो सहर पर
मेरी है थोड़ी भी इज़्ज़त कौन जाने
वाह तो भरपूर मिल जाती है ग़ाफ़िल
पर बड़ाई है के तुह्मत कौन जाने

(कुछ लकीरें टेढ़ी मेढ़ी खेंच दी सफ्हा-ए-दिल पर
लोग देखे और बोले शा’इरी उम्दा हुई है)

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जून 10, 2016

दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

जान लो क़त्ल हो गया अपना
नैन उससे अगर मिला अपना

तू ही था अपना पर है ग़ैर का अब
दिल तो वैसे भी कब रहा अपना

मैक़दा है ये पास आजा अदू
साथ याँ कौन है दिया अपना

अब तलक आलमे बेहोशी है
मुस्कुराकर कोई कहा अपना

हार अपनी कहूँ के जीत कहूँ
जो है जीता वो ख़ास था अपना

शाने महफ़िल है क़स्म से ग़ाफ़िल
शे’र मारा हुआ तेरा अपना

(अदू=दुश्मन)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जून 06, 2016

किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

बदल जाना तेरा यूँ और उस पर भी फज़ीहत ये
के अब हर पल रक़ीबों से हमारी ही शिक़ायत ये

न करना भूलकर भी भूल हमको कम समझने की
वगरना तुझको लेकर डूब ही जाएगी आदत ये

हमारे पास पहले से बहुत धोखे हैं वैसे भी
इनायत कर तू इतनी अब न कर हम पर इनायत ये

हम अपने चाहने वालों को लेंगे खोज ही इक दिन
पसीना बह रहा है रंग भी लाएगी मेहनत ये

चलो अच्छा हुआ जो हुस्न से है उठ गया पर्दा
नहीं तो झेलता रहता ही जी ता’उम्र ज़िल्लत ये

कहा था कौन ग़ाफ़िल इश्क़ फ़र्माने को बतलाओ
किसी भी तर्ह जीने दे नहीं सकती है तुह्मत ये

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जून 04, 2016

जेवर क़ीमती तक आ गये

नेकियाँ थीं ऑप्शन फिर भी बदी तक आ गये
सामने दर्या था और तुम तिश्नगी तक आ गये

पाँवों की जुम्बिश से तुमको कब रहा है इत्तेफ़ाक़
बात कुछ है चलके जो मेरी गली तक आ गये

क्या किसी की लाश को मिल भी सकी इसकी पनाह
सोचता हूँ फ़ालतू ही तुम नदी तक आ गये

है मेरे अल्लाह का ही सबसे ऊँचा मर्तबा
क्या करोगे इस भुलावे में नबी तक आ गये

कुछ क़दम ही दूर है अब मंज़िले उल्फ़त जनाब
हम सभी उश्शाक़ शे’रो शाइरी तक आ गये

नक़्ल की रौनक़ के आगे पानी भरने को ग़ज़ब
देखिए ग़ाफ़िल जी जेवर क़ीमती तक आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जून 02, 2016

हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

तुह्मत तो आप हम पर थे शौक से लगाए
है दाद बाँटनी तो हम क्यूँ न याद आए

गर इश्क़ हम किये तो फ़र्मा दिए भी सच सच
हम जब भी मात खाए तो इस सबब ही खाए

हुस्नो हसब ही बाइस उसके गुरूर के हैं
पर क्या पड़ी है किसको उसको जो यह बताए

छेड़ा तो इश्क़ का सुर दिल ने हमारे लेकिन
नखरों के उसके चलते वह टूट ही न जाए

शमशान तक ही चाहे जाना तो लाज़िमी है
ज़न्नत किसे मिली है घर बैठे और बिठाए

दुनिया-ए-इश्क़ का भी हो क्या बयान ग़ाफ़िल
हर ओर तिश्नगी है हर ओर ग़म के साये

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 28, 2016

हम संभल गये

कल क्या थे और आज वो कितना बदल गये
गिरगिट से भी जनाब कुछ आगे निकल गये

जी में हमारे आग लगाने को मोहतरम
आए हज़ार बार मगर खुद ही जल गये

देखा जो जामे चश्म तो फिर आ गया क़रीब
और ये हुआ के तीरे नज़र दिल पे चल गये

रोना भी यार अपना ग़ज़ब दे गया नफ़ा
जी में थे जो मलाल सब अश्कों में ढल गये

कुछ और ही तरह से अनासिर का अस्र है
जोे आप भी तो चाँद के आते पिघल गये

कल की न बात कीजिए मालूम भी है क्या
आया तो एक भी न मगर कितने कल गये

ग़ाफ़िल जी राजे इश्क़ यहाँ फ़ाश यूँ हुआ
वे तो नज़र गिराए मगर हम सँभल गये

अनासिर=पंचभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश)
-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 27, 2016

कहा लोग साहिल पे ही डूबते हैं

न जाने वो क्यूँ बारहा पूछते हैं
हम उनके सिवा और क्या चाहते हैं

उन्हें देखकर हैं न आँखें अघातीं
हमें प्यार से जब भी वो देखते हैं

हुज़ूर इस तरह देखना कनखियों से
हमें है पता आप क्या चाहते हैं

लज़ाकर हुए आप जो पानी पानी
हम अब आप में डूबते तैरते हैं

हुआ जाए अम्नो सुकूँ सब नदारद
फिर उल्फ़त का हम भूत क्यूँ पालते हैं

किनारे ही ग़ाफ़िल लगा डूबने तो
कहा लोग साहिल पे ही डूबते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मई 24, 2016

बुत कोई यूँ न तराशा जाए

वो बताए तो भला क्या जाए
पास मेरे वो अगर आ जाए

मुझको बोले हो अगर आने को
उसको भी यार बुलाया जाए

दिक्कतें मैंने सहीं छोड़ो भी
क्यूँ ज़माने को लपेटा जाए

आशिक़ी तो है इबादत यारो
क्यूँ न इस तर्ह भी सोचा जाए

ख़ूब हो पर न हो महबूब का अक्स
बुत कोई यूँ न तराशा जाए

मुझको तारीफ़ की चाहत न ज़रा
पर न यूँ हो के न देखा जाए

काम ग़ाफ़िल न करो यूँ के तुम्हें
हर तरफ़ से ही लताड़ा जाए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मई 23, 2016

यूँ ही

न आता है कोई यादों में यूँ ही
न घुलता है नशा साँसों में यूँ ही

जवाँ कज़रारी शब नाज़ो अदा से
खिंची जाए मेरी आँखों में यूँ ही

तज़र्बा है बहुत हुस्नो हसब का
न उलझाओ मुझे ख़्वाबों में यूँ ही

तेरे दीदार से महरूम हूँ मैं
गुज़रता वक़्त है सदियों में यूँ ही

अरे वो शब! गयी थी हिज़्र में जो!
ले आया क्यूँ उसे बातों में यूँ ही

यक़ीनन मुस्कुराया होगा ग़ाफ़िल
नहीं चर्चा चली गलियों में यूँ ही

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मई 22, 2016

ख़्वाब आते हैं

ताब तो ख़ुद देखने की है नहीं उनमें
आईना हमको वो जाने क्यूँ दिखाते हैं
चूम गुंचे जाने कितने और किन किन को
बरगलाने शब को सारे ख़्वाब आते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मई 18, 2016

आप

क्यूँ बेवफ़ा का नाम लिए जा रहे हो आप
महफ़िल क्यूँ उसके नाम किए जा रहे हो आप
ग़ाफ़िल जी भूल जाओ गो पुरलुत्फ़ दर्द है
जुल्मत को ख़ुद का नाम दिए जा रहे हो आप

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 14, 2016

क्या क्या कर गुज़रते हैं

बड़ा शुह्रा ज़माने में रहा परहेज़गारी का
हुआ कुछ तो के अब जो शेख़ मैख़ाने में मिलते हैं
बड़ी है बात ग़ाफ़िल! नाज़नीं इक मुस्कुरा दे बस
तो हज़रत ख़ुद के जी के साथ क्या क्या कर गुज़रते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मई 11, 2016

दम मेरा छूट जाए

जब मौत मेरी आए तो आए इस तरह के
बाहों में तेरी ग़ाफ़िल दम मेरा छूट जाए

-‘ग़ाफ़िल’

आर करो या पार करो

इश्क़ में जीने वालों का जीना ही मत दुश्वार करो
हे ईश्वर! हम उश्शाक़ों का भी तो बेड़ा पार करो

लुत्फ़ भला क्या जब मेरे शिक़्वे कर रहे रक़ीबों से
जितना भी करना है मुझसे ही मेरे सरकार करो

ऐसा भी है नहीं के मुझको ही तुमसे है इश्क़ हुआ
तुमको भी है प्यार, न उसका भले यार इज़हार करो

तलब लगे तो मुझे पिलाओ आँखों से आबे अह्मर
नहीं तुम्हारा कुछ जाएगा इतना तो दिलदार करो

रोज़ रोज़ दौराने इश्क़ां लुकाछुपी मंज़ूर नहीं
करना है जो करो आज ही, आर करो या पार करो

क़त्ल शौक से हो जाएगा ये ग़ाफ़िल बस इक पल में
आँखों को थोड़ी जुंबिश दे अपनी नज़र कटार करो

(उश्शाकों=आशिक़ लोगों, आबे अह्मर=लाल रंग की एक ख़ास शराब)

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मई 10, 2016

फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

चश्म तर थे पर लड़े भी ख़ूब थे
याद है क्या हम मिले भी ख़ूब थे

मंज़िले उल्फ़त रही हमसे जुदा
गो के उस जानिब चले भी ख़ूब थे

नाज़नीं का रुख़ समझ कर चाँद हम
वक़्त था जब देखते भी ख़ूब थे

था चढ़ा भी इश्क़ का सर पे जुनून
और फ़र्माते डरे भी ख़ूब थे

जिस्म दो इक हो न पाए उम्र भर
गो दिलोंं में राबिते भी ख़ूब थे

ख़ुश्बुओं से था चमन महरूम और
फूल ग़ाफ़िल जी खिले भी ख़ूब थे

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मई 09, 2016

हज़ारों हुए जा रहे जलने वाले

समझ में न आए ज़रा भी ये ग़ाफ़िल
ख़ुदा जाने क्या क्या रवायत बनाई
हज़ारों हुए जा रहे जलने वाले
मिली जो मुझे सीधी सादी लुगाई

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मई 07, 2016

मुझको भले निशाना कर लो

मुझ तक आना-जाना कर लो
इतना तो मनमाना कर लो

इश्क़ मुझी से होना तै है
चाहे लाख बहाना कर लो

तुम भी मजनूं हो जाओगे
बस मुझसे याराना कर लो

मेरी आँखें मैख़ाना हैं
जी अपना मस्ताना कर लो

कभी तो छूटे तीर नज़र का
मुझको भले निशाना कर लो

शौके सुख़न है गर ग़ाफ़िल जी
इक उस्ताद पुराना कर लो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मई 06, 2016

इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

दर्द देने की मुझे तेरी भी फ़ित्रत है क्या
मेरे जज़्बात से तुझको भी अदावत है क्या

मुझको रुस्वा जो किया इश्क़ में करता हूँ मुआफ़
देख पर पास तेरे थोड़ी भी इज़्ज़त है क्या

इश्क़ मैंने है किया जिससे वही बुत ठहरा
कोई बोले तो सही यह भी इबादत है क्या

इश्क़बाज़ी की मेरे चर्चा सरेआम हुई
है ये तारीफ़ नहीं तो फिर ये तुह्मत है क्या

जो लपट सी है उठी जाये मेरे सीने में
है न तेरी तो फिर दुनिया की इनायत है क्या

लोग उम्मीद लगाए हैं ग़ज़ब ग़ाफ़िल से
इश्क़बाज़ों को भला काम की फ़ुर्सत है क्या

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अप्रैल 27, 2016

घाटियों में मुझे उतरना है

ज़िन्दगी में जो मेरे लफड़ा है
रहमतों से तुम्हारे पैदा है

वक़्त कोई बुरा नहीं होता
मान जाओ जो यह तो अच्छा है

बुज़्दिलों लड़ तो यूँ रहे जैसे
बस रक़ाबत तुम्हारा पेशा है

कुछ भी सोचा न जड़ दिया तुह्मत
है वो आशिक़ के इक लफंगा है

चोटियों की है नाप ले ली अब
घाटियों में मुझे उतरना है

कब ख़ुदा हो गया पता न चला
संग, मैंने जिसे तराशा है

दिल पे ग़ाफ़िल के वार करते हो
जानकर भी के यह तुम्हारा है

-‘ग़ाफ़िल’
(फोटो गूगल के सौजन्‍य से)

मंगलवार, अप्रैल 26, 2016

सुनो! बस हुक़्म दो! चाहोगे जो, बेहतर दिखा देंगे

जो यह पूछे हो के हम इश्क़ में क्या कर दिखा देंगे
सुनो! बस हुक़्म दो! चाहोगे जो, बेहतर दिखा देंगे
हैं ग़ाफ़िल तो मगर इतने भी हम ग़ाफ़िल नहीं हैं के
तुम्हारी तिश्नगी हो और हम सागर दिखा देंगे

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अप्रैल 24, 2016

ग़ाफ़िल अब और नाज़ उठाया न जाएगा

अब तेरे कू-ए-संग में आया न जाएगा
जी पत्थरों के बुत से लगाया न जाएगा
तेरे सितम हज़ार सहा ज़ेह्नो जिस्म पर
ग़ाफ़िल अब और नाज़ उठाया न जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2016

जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

हुस्न शायद जो मुझे हासिल नहीं है
ख़ूब है पर इसका मुस्तक़्बिल नहीं है

जानता है ख़ासियत क्या इश्क़ की तू
इस समन्दर का कोई साहिल नहीं है

इश्क़ का आया नहीं तुझको सबक और
क्या मज़े से कह रहा मुश्किल नहीं है

क्या करें उश्शाक़ ऐसा दौर आया
रास्ते हैं लाख पर मंज़िल नहीं है

आश्नाई भी हो तो कैसे हो तुझसे
है पता जब तू कोई क़ातिल नहीं है

देखने को नाज़नीनों में है सब कुछ
और देने को ज़रा भी दिल नहीं है

कह दिया तो कह दिया, माना के जानम
शे’र तेरी बज़्म के क़ाबिल नहीं है

लोग कहते हैं करूँ क्यूँ ख़ैरमक़्दम
जो भी है तू पर कोई ग़ाफ़िल नहीं है

( मुस्तक़्बिल=भविष्य, साहिल=किनारा, बज़्म=महफ़िल, उश्शाक़=आशिक़ लोग, ख़ैरमक़्दम=स्वागत)

बुधवार, अप्रैल 20, 2016

कोई शब मुझको बुलाएगा

हंसाएगा, रुलाएगा, बहाने भी बनाएगा
पता है यह के तू हर गाम मुझको आज़माएगा

मुझे क़ाफ़िर कहा, माना के पीता हूँ निग़ाहों से
अरे क्या शेख़ अपना क़ाइदा यूँ ही चलाएगा?

कोई उम्मीद तो अब हो के मेरा यार शिद्दत से
तसव्वुर में ही लेकिन कोई शब मुझको बुलाएगा

है दिल अब हादिसों का शह्र, था जो अम्न की बस्ती
अदा-ओ-नाज़ से ज़ालिम तू कब तक क़ह्र ढाएगा

निशाना चूकना तेरी निग़ाहों का बदा है गर
तो आऊँ लाख तेरे सामने पर चूक जाएगा

लिया ग़ाफ़िल से है पंगा यक़ीं हो जाएगा ऐ दिल
के तेरी तर्फ़दारी में यहाँ कोई न आएगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 18, 2016

आओ शादी शादी खेलें

आदाब दोस्तो! चार लाइन बस एवैं-

आओ शादी शादी खेलें
तन मन की बर्बादी खेलें
खेल चुके अब ख़्वाब सुहाने
ग़ुम होती आज़ादी खेलें

आओ शादी शादी खेलें...

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अप्रैल 16, 2016

आदमी के हुआ सर का भार आदमी

हैं ख़रीदार भी बेशुमार आदमी
बेचता है धड़ल्ले से प्यार आदमी

बेवफ़ाओं की चर्चा सरेआम है
पर किये जा रहा ऐतबार आदमी

इश्क़ में जाँ लुटाने की फ़ुर्सत किसे
बस लगाता है यूँ ही गुहार आदमी

पॉलिसी इश्क़ के मॉर्केट की है यूँ
टूटता जा रहा कि़स्तवार आदमी

अश्क गौहर हैं आई न इतनी समझ
और रोता रहा जार जार आदमी

यार ग़ाफ़िल यही दौरे दुश्वार है
आदमी के हुआ सर का भार आदमी

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2016

कौन आएगा

जाम आँखों से पिलाने कौन आएगा
इक सिवा तेरे दीवाने कौन आएगा

ठीक है कर ले तग़ाफ़ुल ऐ ज़माने तू
सोचना पर आज़माने कौन आएगा

सुर्ख़ियों में नाम मेरा आ गया पर अब
सुर्ख़ आँखों से बचाने कौन आएगा

जा रहा जो दिल दयारां से, जा बंजारे!
फ़र्क़ क्या दिल तोड़ जाने कौन आएगा

आज फिर सैलाब सा है दिल के दर्या में
देखता हूँ डूब जाने कौन आएगा

तेरी ताबानी-ए-रुख़ गर कम हुई तो जी
एक ग़ाफ़िल का जलाने कौन आएगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अप्रैल 13, 2016

आए क़रार भी तो मुकरने के बाद ही

आए है लुत्फ़ यार पे मरने के बाद ही
जाना की संगे कू से गुज़रने के बाद ही

देखा है मैंने यह भी के हर बुततराश को
धोखा दिया बुतों ने संवरने के बाद ही

छाया दिलो दिमाग़ पे है इश्क़ का सुरूर
दुनिया दिखेगी लेकिन उतरने के बाद ही

मुझको जो दिलफ़रेब ने लाचार कर दिया
समझो के अश्क आँख में भरने के बाद ही

ग़ाफ़िल! जो चाहो चीज़ वो मिलती है क्या भला?
आए क़रार भी तो मुकरने के बाद ही

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अप्रैल 11, 2016

होता ग़ाफ़िल तो क्या नहीं होता

घर किसी का बसा नहीं होता
प्यार गर कुछ रहा नहीं होता

जिस क़दर राह रोक रक्खे हो
इश्क़ यूँ भी अता नहीं होता

ज़िन्दगी के हज़ार नख़रे हैं
पर कोई आप सा नहीं होता

बात चल दी तो चलती जाएगी
गोया के उसके पा नहीं होता

मै तो पीता हूँ पर तज़ुर्बा है
इश्क़ जैसा नशा नही होता 

पास तो सब हैं फिर भी लगता है
होता ग़ाफ़िल तो क्या नहीं होता

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अप्रैल 08, 2016

कितने अस्बाब हैं जी मेरा चुराने वाले

सुब्ह सूरज को अगर दीप दिखाने वाले
काश! हो पायँ दीया शब को जलाने वाले

सोचने से ही फ़क़त कुछ भी न हासिल होगा
सिर्फ़ तक़दीर पे ऐ अश्क बहाने वाले

बात बेढब है मगर फिर भी कहे देता हूँ
आईना ख़ुद भी कभी देखें दिखाने वाले

ये क़यामत का शबाब उसपे तबस्सुम तेरा
कितने अस्बाब हैं जी मेरा चुराने वाले

एक ग़ाफ़िल की ज़रा देखिए तासीरे अश्आर
शे’र सुन सो ही गये ताली बजाने वाले

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, मार्च 30, 2016

उसे हूर मिलती है बैठे बिठाए

गली में तेरी शख़्स जो मार खाए
सनद मिल गयी जूँ वो आशिक़ कहाए

चलो कुछ हुआ तो मुहब्बत से हासिल
सनम बेवफ़ा है यही जान पाए

नहीं इल्म रस्में मुहब्बत की जिसको
उसे हूर मिलती है बैठे बिठाए

परीशाँ है जी यार मेंरा तभी से
ख़ुदा शेख़ जी जब से ख़ुद का बताए

पिटेगा तू ग़ाफ़िल है कू-ए-सनम वो
चला जा रहा यूँ क़दम जो बढ़ाए

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, मार्च 26, 2016

मैंने क़दम ज़रा भी बहकने नहीं दिया

इल्ज़ाम हुस्ने यार पे लगने नहीं दिया
दिल चाक हो गया पै तड़पने नहीं दिया

ठोकर लगी हज़ार मगर देखिए ज़ुनूँ
मैंने क़दम ज़रा भी बहकने नहीं दिया

सरका अगर तो सरका है मेरा वज़ूद ही
दामन हया का मैंने सरकने नहीं दिया

जलने को था मैं आतिशे हिज़्राँ में बेतरह
उम्मीदे वस्ले यार ने जलने नहीं दिया

वो इस तरह से जमके तग़ाफ़ुल रहा था कर
तीरे नज़र भी जी में उतरने नहीं दिया

ग़ाफ़िल को फ़िक़्र थी न कहीं आप डूब जायँ
और आपने उसे ही सँभलने नहीं दिया

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 21, 2016

मार खानी है बहुत

इसलिए भी दिलसितां की याद आनी है बहुत
जूतियों की मेरे चेहरे पर निशानी है बहुत

और थोड़ी पीऊँगा है गोया कोटा फुल हुआ
वैसे भी घर जाके मुझको मार खानी है बहुत

आप जो हैं प्लेन से तो फिर जहन्नुम दूर क्या
मेरा क्या! है साइकिल वह भी पुरानी है बहुत

आजकल महफ़िल में चाँदी काटते हम रंगबाज़
ताल पे दे ताल शीला पर जवानी है बहुत

पढ़ गया पूरा, मगर ग़ाफ़िल जी कर देना मुआफ़
आपके दीवान में भी लंतरानी है बहुत

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 20, 2016

मुझे भी जानना है किस सिफ़त का अम्न होता है

ग़ज़ब यह है के अब दिल चौक पर नीलाम होता है
पड़े है फ़र्क़ क्या इससे के तेरा है के मेरा है

अरे बीमार हूँ क्या जो मुझे ऐसा लगे हरदम
के इस रंगीन दुनिया में मिला हर शख़्स अपना है

न जानूं है ये क्या जो हूँ उसी की तर्फ़दारी में
मुझे जिस शख़्स ने हरहाल में हर वक़्त लूटा है

ग़ज़लगोई है फ़ित्रत में लिहाज़ा हुस्नवालों का
मेरे ज़ेह्नो जिगर से क़ुद्रतन भी एक रिश्ता है

कभी जब मुस्कुराना तो मुझे भी इत्तिला करना
मुझे भी जानना है किस सिफ़त का अम्न होता है

है जज़्बा-ए-मुहब्बत जो बला की तंगहाली में
भी ग़ाफ़िल चाँद सूरज तोड़ लाने को मचलता है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, मार्च 18, 2016

ख़ुदा ख़ैर करना मेरे दुश्मनों की

मिली आज सौग़ात जो नफ़्रतों की
भला क्या ज़ुरूरत हो और आँधियों की

समन्दर किनारा तो दे ही दे लेकिन
पता उसको फ़ित्रत जो है बुज़्दिलों की

कोई मुस्कुराया मुझे देख कर फिर
ख़ुदा ख़ैर करना मेरे दुश्मनों की

वो रूठें हैं सुब और शब भर न माने
नज़ाक़त का मारा हूँ मैं कमसिनों की

कहूँगा नहीं यह के उसके ही निस्बत
मुझे याद आए है अमराइयों की

ये पक्का है ग़ाफ़िल मुहब्बत में है तू
न परवा है जो ख़ार के रास्तों की

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मार्च 13, 2016

छोड़ दे

आदाब!

क्यूँ कहे जाते हो ग़ाफ़िल प्यार का
गीत गाना गुनगुनाना छोड़ दे
गो फ़साना दिल के लुटने का है पर
बात यह क्या के सुनाना छोड़ दे

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, मार्च 07, 2016

हम तो यूँ ही सनम मुस्कुराने लगे

लो सुनो होश क्यूँ हम गंवाने लगे
अब रक़ीब आपको याद आने लगे

इश्क़बाज़ी भी है इक इबादत ही तो
आप क्यूँ इश्क़ से मुँह चुराने लगे

उनके आने का हासिल है इतना फ़क़त
हिज़्र को सोच हम जी जलाने लगे

ये न समझो के है ये कोई दांव इक
हम तो यूँ ही सनम मुस्कुराने लगे

कू-ए-जाना में कुछ ख़ास तो है के जो
पा ज़हीनों के भी डगमगाने लगे

अब डराये हैं ख़ामोशियाँ आपकी
आप ग़ाफ़िल को यूँ आज़माने लगे

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, मार्च 01, 2016

के हैं गुंचे खिले तितलियों के लिए

हम हुए जा रहे मुश्किलों के लिए
ख़ार के रास्तों, आबलों के लिए

खंज़रे चश्म से क़त्ल कर दे कोई
है ये पैग़ाम हर क़ातिलों के लिए

मेरे दिल का खज़ाना लुटा तो लुटा
ग़म यही है, लुटा बुज़्दिलों के लिए

राह पर कुछ ग़ज़ाले हैं तफ़रीह को
ख़ुश ख़बर है ये क्या भेड़ियों के लिए

हो न पाया मगर प्यार लिखता रहा
दाद तो दीजिए कोशिशों के लिए

सौहरे शब की मानिन्द रौशन है तू
फिर मचलता है क्यूँ जुगनुओं के लिए

यार ग़ाफ़िल बहार आ गयी तो भी यूँ
जूँ हों गुंचे खिले तितलियों के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, फ़रवरी 27, 2016

अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

किए बदनाम हैं सब आशिक़ी को
मगर हासिल हुआ क्या कुछ किसी को

हसीनों की सिफ़त मालूम है क्या?
नज़र से चीरती हैं आदमी को

किया इज़हार मैंने जो अचानक
अचानक हो गया कुछ उस कली को

चलो यूँ तो हुआ दौरे रवाँ में
नहीं होता ज़रर दिल की लगी को

हक़ीक़त में नहीं तो ख़्वाब में ही
मगर अपना बनाऊँगा उसी को

हुए मासूम से चेहरे सभी के
अरे क्या साँप सूँघा है सभी को

हुआ ग़ाफ़िल न मेरे सा कोई गर
लुटाएगा भला फिर कौन जी को

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 17, 2016

कुछ अलाहदा शे’र : तक़्दीर देखिए

1-
ऐसी ‘बहार’ क्या न हो जिसमें विसाले यार
हर बार ये ही सोचूँ मैं तक़्दीर देखिए
2-
ज़ख़्मों के मेरे चर्चे थोड़े बहुत हुए भी
चर्चे नहीं हुए गर तो आपकी बदी के
3-
आपके रुख़ पे न जाने क्यूँ है पहरा-ए-हिजाब
वर्ना तो पानी भरे हैं आफ़्ताबो माहताब
3-
वो था रू-ब-रू पै कहा लापता हूँ
कहे जा रही है फ़क़ीर उसको दुनिया
4-
रास्ते का शऊर जिसको नहीं
ख़ाक औरों को रास्ता देगा

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, फ़रवरी 06, 2016

मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

सच है यह, तुझसे कोई रिश्ता नहीं
जी तेरे बिन पर कहीं लगता नहीं

है तस्सवुर ही ठिकाना वस्ल का
इश्क़ मुझसा भी कोई करता नहीं

ये भी है तीरे नज़र का ही कमाल
दिल है घाइल उफ़्‌ भी कर सकता नहीं

दर्द है गर तो दवा भी इश्क़ है
इश्क़ सा कुछ और हो सकता नहीं

क्या करोगे आस्तीनों के सिवा
साँप अब दूजी जगह पलता नहीं

घूमता हूँ शह्र की गलियों में पर
मुझको तेरे सा कोई जँचता नहीं

दाद तो ग़ाफ़िल को मिल जाएगी मुफ़्त
मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2016

बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

हर मुहल्ले, हर सड़क पर, हर गली, चारों तरफ़
है तेरा जल्वा, तेरी चर्चा रही चारों तरफ़

आस्माँ पे अब्र भी छाने से कतराने लगे
इस तरह फैली है तेरी रौशनी चारों तरफ़

तुझको मुझसे इश्क़ है ये बात तूने क्यूँ भला
एक बस मुझसे छुपाई औ कही चारों तरफ़

क्यूँ रहे अब धड़कनों पर भी किसी को ऐतबार
बढ़ रही रफ़्तार की दीवानगी चारों तरफ़

ख़ुश बहुत है इश्क़ फिर भी, गो तमाशा बन चुका
हो रही तारीफ़ जो अब हुस्न की चारों तरफ़

रख के शाने पर किसी ग़ाफ़िल के गोली दाग ले
शर्तिया होगी हँसी लेकिन तेरी चारों तरफ़

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, फ़रवरी 04, 2016

मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

नहीं है वस्ल किस्मत में मगर यूँ फ़ासिले क्यूँ हैं
गयीं खो मंज़िलें फिर जगमगाते रास्ते क्यूँ हैं

तुम्हारे पास आने के बहाने सैकड़ों हैं पर
मुझे इक दो बहाने भी नहीं अब सूझते क्यूँ हैं

दिले बह्राँ में उनके है न थोड़ी भी जगह तो फिर
मुझे वो डूबने का लुत्फ़ लेने को कहे क्यूँ हैं

न हो भी ज़ह्र फिर भी फनफनाना तो ज़ुरूरी है
मगर हर साँप आखि़र साँप सूँघे से पड़े क्यूँ हैं

चलो माना मनाने का हुनर मुझको नहीं आता
पता उनको है जब ये राज़ फिर वो रूठते क्यूँ हैं

ये लाज़िम है फिसल जाए सुख़न की राह पर ग़ाफ़िल
उठाने से रहे गर दूर से वो घूरते क्यूँ हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

के हद से गुज़रने को जी चाहता है

शरारों पे चलने को जी चाहता है
के हद से गुज़रने को जी चाहता है

मेरा आज चिकनी सी राहों पे चलकर
क़सम से फिसलने को जी चाहता है

मुझे सर्द आहों की है याद आती
मेरा अब पिघलने को जी चाहता है

क़शिश खींचती है मुझे घाटियों की
के फिर से उतरने को जी चाहता है

तेरे शोख़ दामन में मानिंदे ख़ुश्बू
मेरी जाँ विखरने को जी चाहता है

ग़रज़ के जबीं का न बल हो नुमाया
मेरा भी सँवरने को जी चाहता है

ग़ज़ल सुनके ग़ाफ़िल की बोले तो कोई
के फिर यार सुनने को जी चाहता है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 30, 2016

पसे मुद्दत मेरे क़ातिल ने मुझको फिर बुलाया है

वो मेरे प्यार के जज़्बे को यूँ भी आजमाया है
मुख़ातिब भी रहा है पर न कोई जुल्म ढाया है

बड़ा छुपता रहा है बादलों का साथ पा करके
मेरी चाहत ही थी जो चाँद अब पूरा नुमाया है

हटो! दामन मेरा छोड़ो! मुझे जाना है, जाने दो!
पसे मुद्दत मेरे क़ातिल ने मुझको फिर बुलाया है

चलो है मर्तबा क़ायम यूँ मेरी मैफ़रोशी का
मेरा क़ातिल डुबाकर मै में ही खंज़र जो लाया  है

गो है ये मस्‌अला छोटा मगर आसाँ नहीं है के
कोई ख़ुश्बू को कब तक बन्द करके रोक पाया है

न कुछ भी यूँ है जो के हो नहीं सकता इशारों से
इशारों ने भले चंगे को भी ग़ाफ़िल बनाया है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जनवरी 28, 2016

कुछ जतन कीजिए उस घड़ी के लिए

मौत भी आए तो ज़िन्दगी के लिए
पर किया आपने क्या किसी के लिए

आपसे हिज़्र बर्दाश्त होती नहीं
फिर क्या उम्मीद हो आशिक़ी के लिए

होगा इक दिन यक़ीनन विसाले सनम
कुछ जतन कीजिए उस घड़ी के लिए

आदमीयत को पावों तले रौंदता
हर कोई जा रहा बन्दगी के लिए

यार ग़ाफ़िल बड़े रिस्क का काम है
शा’इरी और भी हर किसी के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जनवरी 27, 2016

उन हवाओं का भला मैं क्‍या करूँ

गर न हो उम्मीद तेरे वस्ल की
उस जगह जाऊँ नहीं मैं भूलकर
उन हवाओं का भला मैं क्‍या करूँ
जो न ख़ुश्‍बू से तेरी हों तर-ब-तर

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 25, 2016

होने लगी है ख़ुद से अदावत नयी नयी

मिलने लगी है मुझको जो शुह्रत नयी नयी
होने लगी है ख़ुद से अदावत नयी नयी

चाहा था मैंने तुझको मगर क्या ख़बर थी यार
बन ठन गले लगेगी मुसीबत नयी नयी

ताने सहा हूँ वैसे बहुत ज़िन्दगी में पर
तानों में तेरे यार है ज़िल्लत नयी नयी

कुछ लोग तोड़ फोड़ के उस्ताद हो गये
मेरी हुई जो तुझसे मुहब्बत नयी नयी

मैं ख़ुश हूँ इसलिए के दिल तेरा चुरा लिया
मुझपर लगी है आज ये तुह्मत नयी नयी

ग़ाफ़िल को और चाहिए भी क्या नसीब से
इसके सिवा के आदते उल्फ़त नयी नयी

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जनवरी 24, 2016

यह भी खाली मकान है शायद

मेरी आफ़त में जान है शायद
उसका बीता ईमान है शायद

क्या तेरे दिल में आशियाँ कर लूँ
यह भी खाली मकान है शायद

उसकी पकवान लग रही फ़ीकी
उसकी ऊँची दुकान है शायद

इश्क़ सामान है तिज़ारत का
उसको ऐसा ग़ुमान है शायद

उड़ रही धूल जो, इसी रस्ते
कोई गुज़रा जवान है शायद

जाम है रोड इश्क़ वालों से
हुस्न का ये सीवान है शायद

अर्जमंद हो गया ये ग़ाफ़िल भी
दिल तेरा मिह्रबान है शायद

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 23, 2016

वो किसी से टूटकर जब प्यार करके आ गये

एक ग़ज़ल यह-

मतला-
आज फिर वो इश्क़ का इज़हार करके आ गये
ज़िन्दगी इस क़द्र भी दुश्वार करके आ गये

अश्आर-
यूँ नहीं वो थे मगर कुछ तो हुआ जो आज दिल
नज़्रे आतिश शौक से सरकार करके आ गये

वो गये थे इश्क़ के बीमार का करने इलाज़
और अपने-आपको बीमार करके आ गये

जो मेरी तक़्दीर थी मंज़ूर थी मुझको मगर
वो मेरी जानिब से क्यूँ इंकार करके आ गये

क्या पता के यूँ था छाया कौन सा उन पर सुरूर
जो रक़ीबों से नज़र दो चार करके आ गये

आईना चेहरे की रौनक़ देखकर हैरान था
वो किसी से टूटकर जब प्यार करके आ गये

इसी ज़मीन पर ग़ज़ल के मिजाज़ से ज़रा हटकर बाद में बना एक शे’र-
चाँद की रोटी बना जज़्बा जलाया सेंक ली
और समझे देश का उद्धार करके आ गये

मक़्ता-
शर्म ग़ाफ़िल जी ज़रा भी तो उन्हें आई नहीं
हुस्न को रुस्वा सरे बाज़ार करके आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 18, 2016

प्यास वैसी नही अब रही क्या करें

जाने क्यूँ जग गयी है ख़ुदी, क्या करें
प्यास वैसी नही अब रही क्या करें

हम परेशान हैं बाद मुद्दत जो वो
बात की भी तो की बेतुकी, क्या करें

कोई हमको बताएगा भी या नहीं
फेंक दें या रखें ये हँसी, क्या करें

ख़ार खाए हुए हों जहाँ सबके सब
फिर वहाँ हम भला शा’इरी क्या करें

गो के शिक़्वा नहीं आपसे है मगर
यार हम भी तो हैं आदमी, क्या करें

गर्म यूँ हैं हमारे ये अश्आर जो
आज ही आग जी में लगी, क्या करें

कोई सैलाब ग़ाफ़िल सा है आ रहा
सकपकाई हुई है नदी, क्या करें

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 11, 2016

शे’र हर एक गुलाबों सा खिला होता है

क्या ज़रर होता है और कैसा नफ़ा होता है
दिल लगाया है फ़क़त ये ही पता होता है

कर दिया मैंने भी आग़ाज़ मगर बतलाओ
प्यार के खेल में क्या और भला होता है

तब तो महसूस करे मेरी ये सीने की जलन
जब मेरा यार रक़ीबों से अदा होता है

मुझको रास आ तो रहा इश्क़ मगर जाने क्यूँ
लोग कहते हैं के अंज़ाम बुरा होता है

क्या ग़ज़ब है के हँसी ही है मसख़रे का नसीब
ग़म जता दे ये कहाँ उसको बदा होता है

होगा ऐसा ही, कहें लोग जो ग़ाफ़िल तेरा
शे’र हर एक गुलाबों सा खिला होता है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, जनवरी 09, 2016

कुछ ख़ास गवाँ बैठे

कुछ ख़ास गवाँ बैठे गोया है सफ़र ज़ारी
अल्लाह करे हम हों मंज़िल की पनाहों में
सोचो तो ज़रा के अब क्यूँ सह्‌म से जाते हैं
आते ही नज़ारे सब इंसान के राहों में

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 08, 2016

हमारा दिल वो उछालते हैं

ग़ज़ब है पैरों पे रखके देखो
हमारा दिल वो उछालते हैं
हम उनके गोया ग़मों के एवज़
में अपनी हर बाज़ी हारते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जनवरी 05, 2016

पढ़ करके इनको चाहे कोई हँसे या रोए

हैं आज के यही सब मेरे गढ़े नमूने
पढ़ करके इनको चाहे कोई हँसे या रोए

ये सर्दियों का मौसम फ़ुर्क़त की लम्बी रातें
कटतीं नहीं हैं गर तो मेरी ग़ज़ल ही गा ले!

बादल गरज रहे हैं बिजली चमक रही है
बारिश शुरू हो इससे पहले ही घर तो कर ले!

भीगी हुई ये बिल्ली कैसे रही है गुर्रा
है ख़ैरियत इसी में कोई इसे भगा दे

ये जिन्न इश्क़ वाला है शोख़ और नाज़ुक
जो चाहे जब भी इसको बोतल में बंद कर ले

आए जनाब तब जब बाज़ार उठ चुकी है
वो मोल कर हैं निकले हैं जब दीवाले

क्या सोचता है ग़ाफ़िल के ये है इक करिश्मा
ज़र्रे यहाँ सभी तो हैं ठोकरों पे पलते

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, जनवरी 04, 2016

उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

मुहब्बत जंग है ऐसी के जिस पल हार जाओगे
उसी पल वाक़ई तुम जीत की ख़ुशियाँ मनाओगे

तुम्हारा मर्तबा क़ायम रहे ये है दुआ मेरी
मगर सच यह भी है के तुम मुझे ही भूल जाओगे

मेरे दर पे न आना है न आओ पर कहो के क्या
तसव्वुर में मेरे आने से ख़ुद को रोक पाओगे

मेरा दामन है कोरा पर मुझे ऐसा लगे है के
जो छूटे ही नहीं वह दाग़ तुम उस पर लगाओगे

मुझे ग़ाफ़िल कहो, पागल या के अलमस्त दीवाना
मैं कबका बन चुका यह सब मुझे अब क्या बनाओगे

लिखा हूँ शे’र दो इक पर मुसन्निफ़ मत समझ लेना
न माने तो मेरे क़िर्दार से धोखा ही खाओगे

बड़ी गुस्ताख़ नज़रें हैं ये ता’ज़ीरात क्या जानें
इन्हें लड़ने से ग़ाफ़िल जी भला क्या रोक पाओगे

(मुसन्निफ़=पद्यकार, ता’ज़ीरात=दण्ड संहिता)

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, जनवरी 03, 2016

मुझको न गिला कोई उसको न शिक़ायत है

इस ओर सलासत है उस ओर नज़ाक़त है
फिर भी है क़शिश कुछ जो आपस में मुहब्बत है

होता है कहाँ ऐसा पर इश्क़ में है अपने
मुझको न गिला कोई उसको न शिक़ायत है

उल्फ़त का भला कैसै इज़हार करें उससे
डर है न चली जाए थोड़ी भी जो इज़्ज़त है

चाहे तो बदल डाले हाथों की लकीरों को
तक़्दीर का रोना पर उसकी भी तो आदत है

हर काम सलीके से हो जाए तो क्या कहने
धोखे में नहीं रहना ये रस्मे मुहब्बत है

ग़ाफ़िल के लिए दुनिया दो हर्फ़ ज़रा हँसकर
बोलेगी नहीं हरगिज़ गोया के ज़ुरूरत है

(सलासत=सरलता)

-‘ग़ाफ़िल’