फ़ेसबुक पर अनुसरण करें-

मेरी फ़ोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

शनिवार, सितंबर 23, 2017

उस शख़्स पर से तीरे नज़र यूँ फिसल गया

मानिंदे बर्फ़ कोह सा पत्थर पिघल गया
हाँ! शम्स दोपहर था चढ़ा शाम ढल गया

छलने की मेरी बारी थी पर वह छला मुझे
मेरा नसीबे ख़ाम वो यूँ भी बदल गया

मुझको पता नहीं है मगर कुछ तो बात है
जो चाँद आज दिन के उजाले निकल गया

साबुन लगे से जिस्म से फिसला हो जैसे दस्त
उस शख़्स पर से तीरे नज़र यूँ फिसल गया

रुख़ उसका मेरी सू था मगर लुत्फ़ ग़ैर सू
वक़्ते अजल मेरा यूँ कई बार टल गया

कहते हैं लोग वह भी तो शाइर है बाकमाल
क्यूँ मुझको यूँ लगा के वही ज़ह्र उगल गया

ग़ाफ़िल जी आप करते रहे शाइरी उधर
तीरे नज़र रक़ीब का जाना पे चल गया

-‘ग़ाफ़िल’