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बुधवार, दिसंबर 07, 2016

अब सवाले इश्क़ पर तू, या कहे हाँ या नहीं

पेचो ख़म बातों का, तेरी ज़ुल्फ़ों सा सुलझा नहीं
अब सवाले इश्क़ पर तू, या कहे हाँ या नहीं

मेरी उल्फ़त की उड़ाई जा रही हैं धज्जियाँ
यह तमाशा क्या तुझे दिखता मेरे मौला नहीं

है वज़ूद इस आईने का अब तलक जो बरक़रार
शायद इसके सामने आया कोई तुझसा नहीं

मुस्कुराना ही फ़क़त है बाँटना खुशियाँ तमाम
मुस्कुराकर देख तेरा कुछ भी जाएगा नहीं

लोग कुछ मेरे लिए पाले हुए हैं यह फ़ितूर
कहने को ग़ाफ़िल है पर है वाक़ई ऐसा नहीं

-‘ग़ाफ़िल’