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शनिवार, अगस्त 19, 2017

ख़्वाहिश अपनी जाके मैख़ाने लगी

जिस अदा से आ मेरे शाने लगी
मुझको रुस्वाई भी रास आने लगी

अब क़यामत मुझपे आने को है, वो
सुन रहा मेरी ग़ज़ल गाने लगी

बाद उसके क्या बताऊँ किस तरह
ख़्वाहिश अपनी जाके मैख़ाने लगी

वस्ल की शब का ज़रा आ पाए लुत्फ़
उसके पहले ही वो क्यूँ जाने लगी

हो कभी शायद ही अब दीदारे गुल
जब कली ही यार मुरझाने लगी

होश में आए भी ग़ाफ़िल किस तरह
फिर वो पल्लू अपना सरकाने लगी

-‘ग़ाफ़िल’