Sunday, September 04, 2011

बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव


बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव,
सबसे सुन्नर, बहुत पियारा बाटै आपन गाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बीते राति सबेरा होई, चिरइन कै कलराँव,
यहि ठौं दिनवा रतियै लागै, घाम कहाँ? कहँ छाँव?
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
बिछुड़ि गये सब टोल-पड़ोसी, बिछुड़ि गयीं गऊ माँ,
वह नदिया, वह नदी-नहावन, वह निबरू की नाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
मोरि मुनरकी सखिया छूटलि, केहि सँग साँझ बिताँव?
ग़ाफ़िल छोट देवरवउ छूटल, अब काको हरचाँव।
                                                  बलमुआ लउटि चलौ...
                                                                                      -ग़ाफ़िल

21 comments:

  1. अब न लौटे कब लौटोगे अब तो दुखता पांव
    बहुत कठिन है शहरी जीवन, पल पल चलता दांव
    ...बलमुआ लौटि चलो वही ठांव।

    ...बहुत सुंदर कविता है गाफिल जी और आगे बढ़ाइये।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. सच में गाँव में ही प्यार है ,स्नेह है ....और सजनी का प्रेम भी

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर भाव अभिव्यक्ति बधाई.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  4. बीते राति सबेरा होई, चिरइन कै कलराँव,
    यहि ठौं दिनवा रतियै लागै, घाम कहाँ? कहँ छाँव?
    बलमुआ लउटि चलौ...
    --
    बहुत सुन्दर और मधुर!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  5. ग़ाफ़िल छोट देवरवउ छूटल ||

    चिरइन कै कलराँव ||


    बहुत ही प्रभावी प्रस्तुति ||
    सादर अभिनन्दन ||

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  6. वाह .सुंदर आंचलिक शब्दों की कविता .....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  7. वाह ,बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ........... मुझे भी गाँव की याद आ गई

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  8. बेहद सुन्दर . आंचलिक गीत भाषिक,भाव सौन्दर्य देखते ही बनता है
    बलमुआ लउटि चलौ...
    बीते राति सबेरा होई, चिरइन कै कलराँव,
    यहि ठौं दिनवा रतियै लागै, घाम कहाँ? कहँ छाँव?
    बलमुआ लउटि चलौ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  9. काश बलमुआ लउटि पाते अपने मन्ने...

    बहुत उम्दा रचना....

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  10. आ अब लौट चलें ...बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  11. घाम कहाँ? कहँ छाँव?

    बहुते बढ़िया!

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  12. मोरि मुनरकी सखिया छूटलि, केहि सँग साँझ बिताँव?
    ग़ाफ़िल छोट देवरवउ छूटल, अब काको हरचाँव।

    इस सुंदर लोकगीत की मिठास मन-हृदय में घुल गई।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  13. क्या बात है! लोकरंग की लोकभावन परिकल्पना अपने निराले रंगों में प्रस्फुटित हो रही है ..... सुन्दर अभिव्यक्ति

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  14. बलमुआ लउटि चलौ वहि ठाँव,
    सबसे सुन्नर, बहुत पियारा बाटै आपन गाँव।
    बलमुआ लउटि चलौ.
    ....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

लिखिए अपनी भाषा में

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...