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सोमवार, दिसंबर 28, 2015

ग़मज़दा हैं दूर से मेरा जनाज़ा देखकर

मेरी सीरत देखकर के मेरा रुत्बा देखकर
आपने मुझको बहुत चाहा था पर क्या देखकर

मैं भला यह क्यूँ कहूँ के जी जला जाए मेरा
ग़ैर जानिब आपको यूँ मुस्कुराता देखकर

क्यूँ पशेमाँ हो रहे अब पास भी आ जाइए
ग़मज़दा हैं दूर से मेरा जनाज़ा देखकर

है पता के हुस्न है मिह्मान बस कुछ रोज़ का
टीस पर उट्ठेगी जी में उसको जाता देखकर

क्या बताऊँ हैं परीशाँ किस तरह सारे रक़ीब
तीर नज़रों का मेरे सीने पे चलता देखकर

हो न हैरानी जिसे वह ख़ाक फ़र्माएगा इश्क़
आपका दामन ये उड़ता बादलों सा देखकर

दाद तो भरपूर मिलती है मगर लगता है के
शे’र सुनकर कम, बहुत ग़ाफ़िल का चेहरा देखकर

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, दिसंबर 26, 2015

तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

ग़म थोड़े बहुत यूँ तो तुमको भी सताएँगे
पर हुस्न का जल्वा है सब हार के जाएँगे

कोई भी नहीं अपना पर फ़िक़्र नहीं कुछ भी
करना है जो हमको वह हम करके दिखाएँगे

यूँ हुस्न के दीवाने माना के हज़ारों हैं
पर इश्क़ बिना वे सब क्या लुत्फ़ मनाएँगे

जाता है किसी का क्या जो शोर मचाते सब
आदत की है मज़्बूरी हम प्यार निभाएँगे

चलते ही रहो प्यारे मंज़िल है अगर पानी
तूफ़ाँ से भी डरना क्या आएँगे व जाएँगे

इस इश्क़े बियाबाँ से ग़ाफ़िल ही गुज़रता है
क्या आप सभी सब कुछ जानेंगे तो आएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, दिसंबर 25, 2015

न हो बर्दाश्त गर तो यह गुनाहे यार लिख देना

भले ही जीत अपनी और मेरी हार लिख देना
मगर सहरा-ए-दिल पे अब्र के आसार लिख देना

सरे महफ़िल तुझे अपना कहा तस्लीम करता हूँ
न हो बर्दाश्त गर तो यह गुनाहे यार लिख देना

ज़मीं से आस्माँ तक इश्क़ की आवाज़ तिर जाए
भले ही चंद पर इस वज़्न के अश्‌आर लिख देना

उफ़नती सी नदी भी बेहिचक मैं तैर जाता हूँ
मेरी किस्मत में रब मत क़श्ती-ओ-पतवार लिख देना

कभी फ़ुर्सत मिले ग़ैरों से तो मेरे भी आरिज़ पे
भले बेमन ही ग़ाफ़िल जी लबों से प्यार लिख देना

आरिज़=गाल

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, दिसंबर 18, 2015

के अच्छे दिन भी आएँगे

जो फोड़े भार इक ऐसा चना अब हम उगाएँगे
तमाशा जो नहीं अब तक हुआ हम कर दिखाएँगे
चलो अच्छा हुआ के आपने वादा न फ़र्माया
नहीं हम सोचते रहते के अच्छे दिन भी आएँगे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, दिसंबर 17, 2015

आपके ही लिए है मेरी ज़िन्दगी

जिस्म भी आपका जान भी आपकी
आपके ही लिए है मेरी ज़िन्दगी

आपके रुख़ से पर्दा हटा दफ़्‌अतन
दफ़्‌अतन जाँ हलक तक मेरी आ गयी

सोचते सोचते वक़्त गुज़रा किया
देखते देखते आस मुरझा गयी

मैं बहुत ही जतन से सहेजा मगर
हो गयी आज रुस्वा मेरी आशिक़ी

आईना तो मेरे बर मुक़ाबिल रहा
आपने ही कहाँ मेरी तारीफ़ की

आपको ज़र्ब कुछ भी न आएगा पर
जान लेगी मेरी आपकी रुख़्सती

आप जाते हैं तो शौक से जाइए
आपको याद ग़ाफ़िल की आएगी ही

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, दिसंबर 12, 2015

मत समझ लेना इसे सर का झुकाना

हिज़्र के हालात में आँसूं बहाना
क्या नहीं है इश्क़ को रुस्वा कराना

गर कहूँ भी तो भला किससे कहूँ मैं
वादा-ए-वस्लत का तेरा भूल जाना

तू बता के मैं भला मुफ़लिस कहाँ जब
पास मेरे है मेरे दिल का खज़ाना

मैं करूँ भी किस तरह बर्दाश्त, तेरा
देखकर ग़ैरों की जानिब मुस्कुराना

दे रहा आवाज़ कोई क्यूँ मुझे अब
तै हुआ है जब मेरा इस दर से जाना

शोख़ी-ए-जाना पे ग़ाफ़िल है फ़िदा पर
मत समझ लेना इसे सर का झुकाना

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, दिसंबर 10, 2015

हो गये कितने मुख़ालिफ़ आजके मंज़र सभी

क्यूँ क़लम करने को आमादा हो मेरा सर, सभी
हो गये कितने मुख़ालिफ़ आजके मंज़र सभी

इस गली से उस गली तक के निशाँ मेरे ही हैं
घिस गये चलने से मेरे राह के पत्थर सभी

क्यूँ भला, जो एक शम्‌अ जल उठी तो ख़ुद-ब-ख़ुद
जल रहे आकर उसी में पास के अख़्गर सभी

आप मानें या न मानें ख़ासियत कुछ है ज़ुरूर
वर्ना क्यूँ तारीफ़ करते आपकी अक्सर सभी

शे'र मेरे अब तलक बेकार थे बर्बाद थे
आपके होंटों को छूकर हो गये बेहतर सभी

जीत जाएँगे यक़ीनन शक नहीं ग़ाफ़िल ज़रा
हार कर पहले दिखाएँ आशिक़ी में पर सभी

अख़्गर=पतिंगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, दिसंबर 07, 2015

इस ज़मीं ने गले लगाया था

आस्माँ जब मुझे गिराया था
इस ज़मीं ने गले लगाया था

बस वही बात रह गयी कहनी
ख़ास जो सोच करके आया था

आह नश्तर चुभा था दिल में और
यह भी के तूने ही चुभाया था

कैसे कह दूँ के था वो तू ही तो
दिल जो मेरा कभी चुराया था

आज तू कर रहा किनारा क्यूँ
जब मुझे कल ही आजमाया था

थी मगर जूँ सराब मंज़िल ही
राहबर तो छँटा छँटाया था

गैर की थी मज़ाल क्या ग़ाफ़िल
आईना ही मुझे रुलाया था

सराब=मृगमरीचिका

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2015

ज़िन्दगी इस तरह भली है क्या

ये मुहब्बत नयी नयी है क्या
आग जी में कभी लगी है क्या

क़त्ल होकर मुआफ़ करती है
ज़िन्दगी इस क़दर भली है क्या

बात कुछ है जो ख़म हुईं नज़रें
आँख ग़ैरों से फिर लड़ी है क्या

कोई बतलाएगा के अक्सर वो
आईने में ही खोजती है क्या

जैसे मह्सूस हो रूमानी कुछ
उसकी चर्चा यहाँ चली है क्या

यार ग़ाफ़िल नशा-ए-दौलत, अब
ज़िन्दगी से भी क़ीमती है क्या

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, दिसंबर 02, 2015

औ नमी है तो फिर तिश्नगी किसलिए

यार आँखों में यूँ है नमी किसलिए
औ नमी है तो फिर तिश्नगी किसलिए

रूठने और मनाने की आदत नहीं
फिर किया आपने आशिक़ी किसलिए

नाफ़रामोश हैं, होश है, जोश है
फिर भी रिश्तों में मुर्दानगी किसलिए

आदमी आज तक जंगली ही रहा
बस बदलती रही है सदी, किसलिए

एक हद तक हैं पर्दे के क़ाइल सभी
फिर बदन की ये बेपर्दगी किसलिए

घर वही, रुत वही, वो ही क़िर्दार है
आईने की उड़ी खिलखिली किसलिए

उसको मालूम क्या ज़िन्दगी का मज़ा
जो कहे जा रहा दिल्लगी किसलिए

अब तलक दर-ब-दर है भटकती रही
एक ग़ाफ़िल की ज़िन्दादिली किसलिए

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 29, 2015

लगे क्यूँ मगर हम अकेले बहुत हैं

अगर देखिएगा तो चेहरे बहुत हैं
लगे क्यूँ मगर हम अकेले बहुत हैं

चलो इश्क़ की राह में चलके हमको
न मंज़िल मिली तो भी पाये बहुत हैं

ये माना के है ख़ूबसूरत जवानी
मगर पा इसी में फिसलते बहुत हैं

मज़ेदार है ज़िन्दगी इसलिए के
न हासिल हो कुछ पर तमाशे बहुत हैं

ये सच है के उल्फ़त निभाते हुए हम
उजालों में ही यार भटके बहुत हैं

रहे इश्क़ वैसे भी पुरख़ार है और
गज़ब यह के पावों में छाले बहुत हैं

उन्हें बैर था या मुसाफ़ात हमसे
वो जानिब हमारी जो आए बहुत हैं

भला ये क्या तुह्मत के जग जग के ता'शब
न जाने क्या ग़ाफ़िल जी लिखते बहुत हैं

मुसाफ़ात=दोस्‍ती

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 26, 2015

ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

हो लगा तड़का अगर तकरार का
ख़ूबसूरत है फ़साना प्यार का

आँधियों में जब उड़ा पत्ता वो ज़र्द
सब कहे जाने दो है बेकार का

ठीक है वो हैं तगाफ़ुल कर रहे
होगा ये उनका तरीक़ा प्यार का

क्या ज़रर हो मुस्कुरा करके कोई
हाल ले ले गर दिले बीमार का

सच बता कैसे हुआ हासिल तुझे
गुमशुदा ये दिल हमारे यार का

हौसिला तो दे ख़ुदा ग़ाफ़िल को अब
नाज़नीं से इश्क़ के इज़हार का

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 22, 2015

गर तेरी आँखों का पैमाना न होगा

मै न होगी और मैख़ाना न होगा
गर तेरी आँखों का पैमाना न होगा
जुल्म यह के रुख़्सती है तै यहाँ से
और फिर वापस मेरा आना न होगा

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 18, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : हो ही जाते हैं गुलाबी सब-के-सब चेहरे हसीन

1-
जो कैदी है ज़माने से वही तो है ज़मीर अपना
कभी सोचा है यारों के उसे भी अब छुड़ाना है?
2-
कमाई हैं सदियाँ जो दौलत वफ़ा की
उसे लम्हे चाहें रखें या उड़ा दें
3-
किस तर्ह बचे अस्मत अब सोच ज़रा ग़ाफ़िल
मजनू के सगे हैं सब जो साथ हैं डोले के
4-
अजब उलझी हवाओं की लटों को,
न पूछो किस तरह सुलझा रहा हूँ।
5-
ज़ख़्मे दिल पर इश्क़ का मरहम कोई
गर लगा दे फ़ाइदा हो जाएगा
6-
आज अह्बाब हँस रहे मुझ पर
इश्क़ का भी अजब करिश्मा है
7-
आज कोई वहीं नहीं मिलता
चाहिए था जिसे जहाँ होना
8-
महफ़िल की तेरे यार है ये कैसी ख़ासियत
आती ज़ुबान पर है तेरे बाद शा’इरी
9-
कुछ तो है जो बज़्म में ग़ाफ़िल के आते ही जनाब
हो ही जाते हैं गुलाबी सब-के-सब चेहरे हसीन
10-
जी मेरा जलाने की आदत न गयी उनकी
रंगीन तितलियों पे अब भी हैं मचल जाते

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, नवंबर 16, 2015

औ मुसन्निफ़ भी तो कोई व्यास होना चाहिए

फिर कोई इक कृष्ण सा बिंदास होना चाहिए
औ मुसन्निफ़ भी तो कोई व्यास होना चाहिए

मैं चला आऊँगा दौड़ा दे कोई आवाज़ पर
शर्त इतनी है के मक़सद ख़ास होना चाहिए

मौत भी मेरी ग़ज़ल बन जाएगी ये है यक़ीं
बस मेरा दिलदार मेरे पास होना चाहिए

ज़ोर तो जल्वानुमा होगा मुहब्बत का मगर
आदमीयत का हमें अहसास होना चाहिए

जी रहे अभिशप्त पादप से कई संसार में
क्या नहीं उनके लिए मधुमास होना चाहिए

ख़ूबसूरत आप हैं अहसास हो जाएगा बस
आईने पे आपका विश्वास होना चाहिए

आप ग़ाफ़िल जी कहो क्या इश्क़ करने के लिए
लाज़िमी है ज़ेब में सल्फ़ॉस होना चाहिए?

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 15, 2015

गर आ जाऊँ तो पैमाने न देना

सितम है मैकदे आने न देना
गर आ जाऊँ तो पैमाने न देना

बड़ी ग़ुस्ताख़ महफ़िल की हवा है
हिजाबे दिल को सरकाने न देना

है अच्छा इश्क़ पर इसकी सिफ़त है
सुक़ूँ जी को कभी पाने न देना

लगी पाबन्दियाँ मासूम लब पर
बड़ा है क़ुफ़्र मुस्काने न देना

है पा गर साफ़ तो फिर दिल भी देखो
उसे घर में अभी आने न देना

अभी ग़ाफ़िल को है उम्मीदे वस्लत
इसे बेमौत मर जाने न देना

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 12, 2015

जो हहहहहहहकलाते हैं

हम भी जब तुक से तुक कभी भिड़ाते हैं
बे मानी वाली ही ग़ज़ल बनाते हैं

हमको अच्छी लगती है उनकी बोली
जो हहहहहहहकलाते हैं

पेट सभी का त्यों ही दुखने लगता है
जैसे ही हम अपना कान खुजाते हैं

एक शेर सर्कस से भाग गया जंगल
ठहरो इक बिल्ले को शेर बनाते हैं

हँसने को मुहताज हुए पैसे वाले
कृपा हँसी की उन पर हम बरसाते हैं

सारे होशियार मिलकर हुशियारी की
मुफ़्तै में हमको माला पहनाते हैं

दास कबीरा की आटा चक्की का क्या
गेंहू सँग घुन अब भी ख़ूब पिसाते हैं

आज नहीं मिलने वाली है वाह हमें
शेर वेर हम अपना लेकर जाते हैं

कई चीटियाँ मिल हाथी को चट कर दीं
ग़ाफ़िल जी अब सबको यही बताते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, नवंबर 10, 2015

पर कठिन है प्यार का इज़हार करना

है यही सच के है आसाँ प्यार करना
पर कठिन है प्यार का इज़हार करना

आप मेरे दर से हो दूरी बनाए
सोच क्या है? वस्ल को दुश्वार करना!

एक क्यूँ इस्रार कर कमतर हो ज़ाहिर
दूसरे की ज़िद हो जब इंकार करना

आईने को तोड़ देना वाक़ई में
ख़ुद की ही सूरत को है बेकार करना

चाँद भी तो सोचता होगा, कोई शब
मौज़ करना, ठाट से इतवार करना

क़ाइदन बेपर्दगी अच्छी नहीं पर
हो सके तो बरहना रुख़सार करना

अब तलक हूँ शाद के रब मिह्रबाँ है
आपकी फ़ित्रत गो है बीमार करना

क्या भला ग़ाफ़िल सा होगा और कोई
आपको, इक था न ख़िदमतगार करना?

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, नवंबर 09, 2015

याद तेरी है तो दीवाली है

फ़र्क़ क्या है के रात काली है
याद तेरी है तो दीवाली है

मद भरे चश्म का तसव्वुर कर
मैंने भी तिश्नगी मिटा ली है

पा मेरे तब ही लड़खड़ाए हैं
जब भी तूने निगाह डाली है

रू-ब-रू है मेरा दिले नादाँ
और तेरी नज़र दुनाली है

अक्स तेरा उभर रहा हर सू
शायद अब नींद आने वाली है

आईने पर नज़र न कर ग़ाफ़िल
क्यूँकि तेरी नज़र सवाली है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, नवंबर 08, 2015

रात का मौसम सुहाना हो गया

चाँद का खिड़की पे आना हो गया
रात का मौसम सुहाना हो गया

फिर फ़ज़ाओं में है लैला की महक़
कैस कोई फिर दीवाना हो गया

आदतन मैं मुस्कुरा देता हूँ पर
यह न समझो के मनाना हो गया

हुस्न के वन में यक़ीं की झाड़ पर
लो मेरा भी आशियाना हो गया

शोख़ियों ने ही किया बर्बाद और
शोख़ियों सँग घर बसाना हो गया

क्या पता ग़ाफ़िल ज़माने से हूँ मैं
या के फिर ग़ाफ़िल ज़माना हो गया

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, नवंबर 06, 2015

एक ग़ाफ़िल की हैं यूँ भी दुश्वारियाँ

आतिशे इश्क़ ज़ारी रहे दरमियाँ
इस सबब है जला फिर मिरा आशियाँ

आज फिर इश्क़बाज़ों की चाँदी हुई
आज फिर गुल हुईं शह्र की बत्तियाँ

लज़्ज़ते इश्क़ का शौक गर है तुझे
माफ़ करती रहे मेरी ग़ुस्ताख़ियाँ

अब रहा एक बस ख़्वाब का आसरा
वस्ल में गर रहीं यूँ परेशानियाँ

बल्लियों मैं उछलना गया भूल, जब
देख उसको उछलने लगीं बल्लियाँ

क्यूँ किसी को सुनाई नहीं पड़ रहीं
आ रहीं जो उजालों से सिसकारियाँ

जब चला उसके दर छींक कोई दिया
एक ग़ाफ़िल की हैं यूँ भी दुश्वारियाँ

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, नवंबर 05, 2015

भइया जी यद्यपि परधानिउ हारे हैं

कयू कलट्टर यसपी का दुत्कारे हैं
नेता जी की आँखों के हम तारे हैं

यक थाना के गारद कै दूने गारद
नेता जी के अगुआरे पिछुआरे हैं

बड़े भागशाली हौ की तुम्हरे घर पे
वोट बदे भइया जी ख़ुदै पधारे हैं

तबौ कबीना मंत्री हैं तक़दीरै है
भइया जी यद्यपि परधानिउ हारे हैं

हर किसान कै फटी ज़ेब, पेटौ खाली
अपनी अपनी किस्मत के बटवारे हैं

कहैं मिठाई लाल कि ग़ाफ़िल सुगर भवा
दीवाली मा फूटे भाग हमारे हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, नवंबर 04, 2015

पर जली है जो चिता वह थी मेरे अरमान की

लोग समझे थे के है वो फ़ालतू सामान की
पर जली है जो चिता वह थी मेरे अरमान की

असलियत में इश्क़ फ़रमाना बहुत आसाँ नहीं
है यहाँ बाज़ी लगी रहती जिगर-ओ-जान की

देखकर नाज़ो अदा तेरी बड़ी उलझन में हूँ
लाज़ रख पाऊँगा कैसे धर्म-ओ-ईमान की

ख़्वाब में महबूब का दीदार करवा कर ख़ुदा
मंज़िले उल्फ़त की मेरी राह क्या आसान की

मैंने सोचा था के तू यादों में ही, पर आएगा
जब नहीं आना है जा यह भी ख़ुशी क़ुर्बान की

अब मुझे ही खोज पाना है कठिन मेरे लिए
धज्जियाँ इस क़द्र बिखरी हैं मेरी पहचान की

ठीक है ग़ाफ़िल पे फ़िक़रे जी करे जितना, कसो
पर ये क्या टोपी उछाले हो दिले नादान की

-‘ग़ाफ़िल’

आदाब!लोग समझे थे के है वो फ़ालतू सामान कीपर जली है जो चिता वह थी मेरे अरमान कीअसलियत में इश्क़ फ़रमाना बहुत आसाँ नहीं...
Posted by Chandra Bhushan Mishra Ghafil on 3 नवंबर 2015

शनिवार, अक्तूबर 31, 2015

शे’र कहता शेर सा हुंकार कर

आज तू तीरे नज़र का वार कर
नीमकश बिल्कुल न, दिल के पार कर

रस्मे उल्फ़त तो निभा जालिम ज़रा
कुछ सितम दिल पर मेरे दिलदार कर

आज जीने का हुनर है सीखना
ज़िन्दगी से जीत कर या हार कर

अब शराबे लब नहीं अब ज़ह्र दे
मुझपे इतना सा करम तू यार कर

नफ़्रतों से ख़ुश है तो जी भर करे
मैं कहाँ कहता हूँ मुझको प्यार कर

है यही ग़ाफ़िल का अंदाज़े बयाँ
शे’र कहता शेर सा हुंकार कर

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 30, 2015

यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

डूबते को एक तिनके का सहारा मिल गया
यूँ भी इक नादान को धोखा क़रारा मिल गया

खुब रहा नश्तर जिगर में उफ़् भी कर पाऊँ नहीं
वाह! तोफ़ा सुह्बते जाना में प्यारा मिल गया

मैं चलूँ इस राह वह चलता रहा उस राह पर
या ख़ुदा इस मिस्ल मुझको यार न्यारा मिल गया

ऐ मेरी किस्मत बता के मैं करूँ तो क्या करूँ
क्यूँ उसी को इस जहाँ का हुस्न सारा मिल गया

बेसबब मुझसे किनारा था किया जिसने कभी
शख़्स वो ही राहे उल्फ़त में दुबारा मिल गया

फिर सजी है सेज़ फूलों की तो इक ग़ाफ़िल को फिर
दार का फ़र्मान शायद आज यारा मिल गया

दार=फाँसी

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 28, 2015

अभी तूने मुझको सताया कहाँ है

अभी तो मुझे लुत्फ़ आया कहाँ है
अभी तूने मुझको सताया कहाँ है

तेरे हर गिले हैं सर आँखों पे लेकिन
बता के मुझे आज़माया कहाँ है

चला आ रहा मुस्कुराता हुआ जो
अरे यार तू चोट खाया कहाँ है

न रखना था गर तो मुझे सौंप देता
तू दिल का ख़जाना लुटाया कहाँ है

अगर आग है तो यक़ीनन जलेगा
अभी आशियाना बनाया कहाँ है

तसव्वुर में भी मेरे आया नहीं जब
सनम वक़्त अपना बिताया कहाँ है

ज़रा जुंबिशे लब पे ही ये तमाशा
अभी शे’र मैंने सुनाया कहाँ है

अभी तेरे ख़ुश होने के दिन हैं ग़ाफ़िल
अभी दिल किसी से लगाया कहाँ है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 26, 2015

इसलिए दूर हम आप सब से रहे

उम्र भर हादिसों से गुज़रते रहे
इसलिए दूर हम आप सब से रहे

मछलियाँ हो गयीं अब सयानी बहुत
सब फिसलती रहीं हम पकड़ते रहे

दिल को तोड़ा है सबने बड़े शौक से
आप भी क्यूँ हिमाक़त ये करते रहे

वक़्त पर हो लिए सब रक़ीबों के सँग
शह्र में यूँ हमारे दीवाने रहे

याद है हर गुज़िश्त: शबे हिज़्र, हम
जिसमें ज़िन्दा रहे पर मरे से रहे

एक ग़ाफ़िल ने ऐसा भी क्या कह दिया
अब तलक आप मुँह जो फुलाए रहे

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अक्तूबर 24, 2015

उधर रस्मे दुनिया इधर आशिक़ी है

अजब कशमकश में मेरी ज़िन्दगी है
उधर रस्मे दुनिया इधर आशिक़ी है

बता यह के बोसा मैं लूँ भी तो कैसे
तेरे रुख़ पे नागिन जो लट लोटती है

तेरा मुस्कुराकर नज़र का मिलाना
जिगर पे जूँ मीठी सी छूरी चली है

चल आ दूँ दिला आईने की गवाही
किया क़त्ल मेरा जो बस तू वही है

तेरे चश्मे मासूम में जाने जाना
कोई चीज़ ख़ंजर सी अक़्सर दिखी है

ये क्या है के कहते हो ग़ाफ़िल तुम्हारी
ग़ज़ल ही हुई है के इक फुलझड़ी है

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 22, 2015

दिल हुआ चोरी सरे बाज़ार है

इश्क़ में तो जीत जाना हार है
है यही सच पर मुझे इनकार है

बारहा खाया हूँ मैं जिससे शिकस्त
वह नज़र के तीर का ही वार है

आँख शीशे की हुई पत्थर का दिल
ऐसी ही ख़ूबी का मेरा यार है

जानते हो क्यूँ तमाशा हो रहा
मर्तबे से ही सभी को प्यार है

मैं बताऊँ आईना टूटा है क्यूँ
सामने आया जो पर्दादार है

आ रहा रोना मिज़ाजे इश्क़ पर
याँ रक़ीबों की अजब भरमार है

शे’र तो शब भर कहे पर इक न वाह
कौन सी यह रस्मे महफ़िल यार है

एक क़त्‌आ-

एक तो हैं आबलों के पा मिरे
और राहे इश्क़ भी पुरख़ार है
बढ़ चुके तो हैं क़दम पर यूँ लगे
यार से मिलना बहुत दुश्वार है

मक़्ता-

शह्र यह चोरों का है ग़ाफ़िल जी क्या
दिल हुआ चोरी सरे बाज़ार है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 20, 2015

दर्द बेइख़्तियार होता है

प्यार क्या इक़्तिसार होता है
आप ही आप यार होता है

बात फ़ुर्क़त की सोच करके ही
दर्द बेइख़्तियार होता है

जी में खुबते हैं जूँ कई नश्तर
जब यक़ीं तार तार होता है

जी जला करके रौशनी की पर
कब किसे ऐतबार होता है

टूटना है नसीब आशिक़ का
कौन याँ ग़मगुसार होता है

दिल के उजड़े चमन का ग़ाफ़िल कौन
यूँ भी आबादकार होता है

(इक़्तिसार=जबरदस्ती, फ़ुर्क़त=ज़ुदाई, ग़मगुसार=हमदर्द, आबादकार=आबाद करने वाला)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 19, 2015

मुखिया बोले झुनिया भै हलकान कहाँ

झूठै शोर मचायौ है शैतान कहाँ
मुखिया बोले झुनिया भै हलकान कहाँ

अब हमरी रक्षा करिहौ ऊपर वाले
कहाँ सबन कै ताना हमरी जान कहाँ

जेल काटि कै झबरा तौ आवा लेकिन
केहू बतावै फूँके रहा मकान कहाँ

भागा रहा निरहुआ तबसे नै लउटा
तुँही कहौ फिर फूँकिस ऊ खरिहान कहाँ

गाँव के सगरौ मनइन कै यक्कै रोना
निबरू बनिया के जइसन ईमान कहाँ

बूढ़ा बरगद अक़्सर पूछै ओ ग़ाफ़िल
झुरई काका वाला हिन्दुस्तान कहाँ

-‘ग़ाफ़िल’

रू-ब-रू होता हमेशा इक नया क़िर्दार है

सोच यह कैसी है के बंदा तो इज़्ज़तदार है
इसलिए उसको न यारों इश्क़ की दरकार है

देखकर मुझको वो ऐसा मुस्कुराए जा रहा
सोचता हूँ यार मेरा किस तरह बीमार है

लग रहा वह इश्क़ की दरिया में डूबेगा ज़ुरूर
कब तलक ख़ुद को डराएगा के यह अंगार है

दिल की दौलत से न जाने क्यूँ हुआ महरूम वह
मंसबे हुस्ने मुज्जसम का जो मंसबदार है

जब के आसानी से मैं रौंदा किया था ख़ार, अब
फूल राहों में बिछे हैं रास्ता दुश्वार है

बावते जाना यूँ ग़ाफ़िल आईना चुप है के जो
रू-ब-रू होता हमेशा इक नया क़िर्दार है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 18, 2015

शरारा-ए-उल्फ़त को कैसे हवा दूँ

अरे आ तुझे प्यार करना सिखा दूँ
तुझे आज मैं जिन्दगी का मज़ा दूँ

कली फूल ख़ुश्बू क्या पूरा चमन ही
तिरे रास्ते मैं मेरी जाँ बिछा दूँ

हम उश्शाक़ की है सितारों से यारी
करे जी, तिरा आज दामन सजा दूँ

अभी जो लिखा इश्क़ का एक नग्मा
इजाज़त तो हो के तुझे मैं सुना दूँ

न बाकी रहे अब कोई रस्मे उल्फ़त
इशारा तो कर दे मैं ख़ुद को लुटा दूँ

ज़ुरूरी हुआ आज ग़ाफ़िल जी बोलो
शरारा-ए-उल्फ़त को कैसे हवा दूँ

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 15, 2015

एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

आप जब भी हमें बुलाए हैं
कुछ न कुछ बेतुकी सुनाए हैं

यूँ समझिए के आपका है लिहाज़
वर्ना हम भी पढ़े पढ़ाए हैं

सर पटकता है कोई पटके हाँ
हमतो वैसे निभे-निभाए हैं

आपने ख़ुद समझ लिया क्या के
आप अपने हैं हम पराए हैं

हमसे सुनिए तो फूल की ख़ूबी
आप जो हमसे ख़ार खाए हैं

याद क्या आप भी रखेंगे के
एक ग़ाफ़िल से मिल के आए हैं

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अक्तूबर 12, 2015

रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

अगर पढ़ने पे ही आए तो बस अख़बार पढ़ लोगे
तुम्हें फ़ुर्सत कहाँ जो हर्फ़े उल्फ़त चार पढ़ लोगे

न कुछ बाकी बचेगा और पढ़ने को ज़माने में
उमड़ता आँख में गर प्यार का इज़हार पढ़ लोगे

मुहब्बत ही वो शै है जो के पत्थर को ख़ुदा कर दे
सबक मुश्किल ज़रा है पर इसे तुम यार पढ़ लोगे

ये गुलशन है, कली है, फूल हैं, सब ख़ूबसूरत हैं
रहे पढ़ते इसे ही जब भला क्या ख़ार पढ़ लोगे

निगाहे लुत्फ़ तो जानिब मिरी इक बार हो जाए
मिरे माथे पे उल्फ़त के लिखे अश्‌आर पढ़ लोगे

मदरसे में कभी ग़ाफ़िल के बस तुम दाख़िला ले लो
रहा वादा मुहब्बत का सबक दमदार पढ़ लोगे

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 11, 2015

तुम कहो ग़ाफ़िल इसे ज़िंदादिली कैसे कहूँ

हिस नहीं उसमें ज़रा भी है अभी कैसे कहूँ
दी उसे मुस्कान की क्यूँ पेशगी कैसे कहूँ

बह्र से जब बुझ नहीं सकती किसी की प्यास तो
हौसिला-ए-बह्र को दरियादिली कैसे कहूँ

आशिक़ी जब मर्तबे को देखकर होवै जवाँ
फिर निगोड़ी को भला मैं आशिक़ी कैसे कहूँ

शख़्स जो बदनीयती की हर हदों को तोड़कर
मुस्कुराए भी उसी को आदमी कैसे कहूँ

इश्क़ करता हूँ बताओ आप ही इस हाल में
आदते आतिशजनी को आपकी कैसे कहूँ

इश्क़ करते हो मगर इज़हार कर सकते नहीं
तुम कहो ग़ाफ़िल इसे ज़िंदादिली कैसे कहूँ

हिस=संवेदना शक्ति
बह्र=समन्दर
मर्तबा=ओहदा

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 09, 2015

ख़्वाब कितने बड़े हो गये

हर्फ़ जो ज़ह्र से हो गये
सब मिरे वास्ते हो गये

देखते देखते या ख़ुदा!
ख़्वाब कितने बड़े हो गये

घर मिरा जल गया भी तो क्या
आसमाँ के तले हो गये

फिर यक़ीनन बहार आएगी
ज़ख़्म मेरे हरे हो गये

बाग में एक गुल क्या खिला
सैकड़ों मनचले हो गये

दिल जुड़ा तो किसी से मगर
हिज़्र के सिलसिले हो गये

राहते जाँ मयस्सर कहाँ
दरमियाँ फ़ासिले हो गये

मंज़िलें नागमणि सी हुईं
साँप से रास्ते हो गये

कीजिए मेरे दिल पे रहम
आप फिर सामने हो गये

चाँद को देख ग़ाफ़िल तो क्या
अब्र भी बावरे हो गये

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 08, 2015

आप हैं के जवाब भूले हैं

जब तुम्हारी गली में आए हैं
यार पत्थर हज़ार बरसे हैं

हुस्न वालों से मात खा खाकर
इश्क़ में हम कमाल करते हैं

शेखियाँ क्यूँ बघारते हो जब
हम तुम्हारे क़रीब होते हैं

और दीदार को रहा भी क्या
मौत का रक्स ख़ूब देखे हैं

आज वो भी लगा रहे तुह्मत
नाज़ जिनके बहुत उठाए हैं

इश्क़ का है सवाल ग़ाफ़िल जी
आप हैं के जवाब भूले हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अक्तूबर 07, 2015

के ली जाँ आदमी ने आदमी की

इनायत गर नहीं होती किसी की
तो बदकारी न मर जाती कभी की

तेरी ख़ुदग़र्ज़ियां मुझको पता हैं
सबब यह है, नहीं जो बतकही की

तू होता संग, संगे-दिल न होता
नहीं होती फ़ज़ीहत बंदगी की

नज़रअंदाज़ उसको भी किया लो
जो हैं ग़ुस्ताखि़याँ तेरी अभी की

अजी मैंने ग़मों की स्याह शब में
जलाया दिल भले, पर रौशनी की

अँधेरी रात के पिछले पहर में
सुनी क्या चीख तूने भी नदी की

खड़ी है आदमी के बरमुक़ाबिल
कली वह एक मुरझाई तभी की

करे अफ़सोस ग़ाफ़िल इसलिए क्या
के ली जाँ आदमी ने आदमी की

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अक्तूबर 06, 2015

तुम्हें लो आ गया जी इश्क़ से इंकार करना भी

मुझे तो अब तलक आया नहीं इज़हार करना भी
तुम्हें लो आ गया जी इश्क़ से इंकार करना भी

हुए कुछ यूँ ज़माने में समझते हैं ज़ुरूरी जो
गुज़रती पुरसुक़ूँ हर ज़िन्दगी दुश्वार करना भी

मज़ा हो के वो मुझको सोच ले मगरूर आशिक़ है
अदाओं से ज़ुरूरी है इसे लाचार करना भी

क़फ़स में इश्क़ तड़पे हुस्न भी है सात पहरे में
रहा मुमक़िन नहीं अब यार का दीदार करना भी

बड़ा दुश्वार है, दौरे रवाँ में हर मुसन्निफ़ को
महज़ शीरीं ज़ुबाँ में इक ग़ज़ल तय्यार करना भी

सभी ग़ाफ़िल पे तो उँगली उठाते हैं मगर सच है
के है आसाँ नहीं उस सा नया क़िरदार करना भी

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अक्तूबर 04, 2015

सभी हारे हुए हैं आदतों से

किसे फ़ुर्सत मिली अपने ग़मों से
सभी हारे हुए हैं आदतों से

हक़ीक़त है कि उल्फ़त ने सिखाया
हमें दो चार होना हादिसों से

एक क़त्‌आ-

तिरे घर की दिलाएं याद हमको
नहीं शिक़्वा हमें है आबलों से
उन्हीं यादों में उलझे हैं, सुक़ूँ है
हम उकताए हैं अक़्सर राहतों से

और अश्‌आर-

हमारे बीच क्यूँ ये फ़ासिले हैं
बहुत डर लग रहा इन फ़ासिलों से

यूँ छलके जाम है आँखों का तेरे
छलकती है तबस्सुम जूँ लबों से

लगे है चाँद तब प्यारा बहुत ही
हमें जब झाँकता है बादलों से

हमेशा मात खाई दोस्ती में
जो ग़ाफ़िल था न हारा दुश्मनों से

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अक्तूबर 02, 2015

चाहता ही रहा यूँ हुआ तो नहीं

सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा तो नहीं
यूँ नज़र फेर लेना बज़ा तो नहीं

दिल धड़कने लगा क्यूँ मेरा यकबयक
हाथ से फिर तेरे वह गिरा तो नही?

थी नज़र क्या लड़ी होश गुम है मेरा
हादिसे में तेरा कुछ गया तो नहीं?

दिल तड़पता रहा और कहता रहा
शाद मैं हूँ मुझे कुछ हुआ तो नहीं

घर जले की शिक़ायत हो क्यूँ आग से
आग तेरी तरह बेवफ़ा तो नहीं

एक ग़ाफ़िल हो और तेरी तीरे नज़र
चाहता ही रहा यूँ हुआ तो नहीं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अक्तूबर 01, 2015

ये लंतरानी किसलिए

कोयलों के बीच कौवे की बयानी किसलिए
शर्मकर ख़ामोश रह ये लंतरानी किसलिए

ख़्वाहिशों के सिलसिले थे, चाँद शब थी और मैं
अब न हैं वे मस्अले फिर शब सुहानी किसलिए

जब हवाएं मिह्रबाँ थीं तो हुई क़श्ती रवाँ
सोचता हूँ नाख़ुदा की फिर प्रधानी किसलिए

आख़िरत में कह रहा है उम्र गुज़री है फ़ज़ूल
गो हक़ीक़त है मगर अब ये बयानी किसलिए

अब मेरी तन्हाहियाँ मुझको बहुत भाने लगीं
फिर मेरे मिलने बिछड़ने की कहानी किसलिए

फिक़्र ग़ाफ़िल को नहीं है सुनके भी चीखो पुकार
ख़ूँ रगों में तो है लेकिन मिस्ले पानी किसलिए

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 29, 2015

कोई अश्कों से धोए जा रहा रुख़सार जाने क्यूँ

दिखे हैं और मेरी मौत के आसार जाने क्यूँ
पशेमाँ है किए पे ख़ुद के वह गद्दार जाने क्यूँ

बड़े बनते मुसन्निफ़ सब, कहो तो मौत लिख डालें
मगर वो लिख नहीं सकते हैं तो बस प्यार, जाने क्यूँ

मेरी जानिब चले आते हैं सूरज चाँद तारे सब
नहीं आते कभी हैं आप ही सरकार जाने क्यूँ

मुक़ाबिल ही सही कोई सफ़र में साथ तो दे दे
हुआ जाए है अब तन्‌हा मिरा क़िरदार जाने क्यूँ

मुझे मालूम है के हुस्न नज़रों की अमानत है
मगर इसके भी हैं हर सिम्त पहरेदार जाने क्यूँ

उड़ाकर गर्द ख़ुद ही, देखिए ग़ाफ़िल जी कमज़र्फ़ी
कोई अश्कों से धोए जा रहा रुख़सार जाने क्यूँ

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 28, 2015

आखिरी सांस तक लड़ा कोई

वह्म है या के राबिता कोई
ख़्वाब में रोज़ आ रहा कोई

इश्क़ आसाँ नहीं है आतिश है
काश! यह बात मानता कोई

इश्क़ की आग जब भी भड़की है
कर न पाया है सामना कोई

इश्क़ में हम जहाँ जहाँ भटके
अब तलक तो न वाँ गया कोई

इश्क़ को किस तरह छुपाओगे
यह न अदना है मस्अला कोई

इश्क़ रुस्वा न हो ज़माने में
आखिरी सांस तक लड़ा कोई

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 27, 2015

मत समझना हम हुए लाचार से

एक ग़ज़ल-

मतला-
लौट जो आए तिरे दरबार से
मत समझना हम हुए लाचार से

हुस्ने मतला-
नाव तो हम खे रहे पतवार से
क्या बचा पाएँगे इसको ज्वार से

अश्‌आर-
कोशिशों ने कर दिया मज़्बूत यूँ
जूँ डिगे पत्थर न जल की धार से

सुह्बते गुल की है ख़्वाहिश पर ये क्या
लोग काफी डर रहे हैं ख़ार से

वक़्त की रफ़्तार पकड़ो साहिबान
क्यूँ यहाँ रोए पड़े बीमार से

क्यूँ कहें किससे कहें जब आप हम
कर लिए रिश्ते सभी व्यापार-से

यह रवायत क्या कि बस गुलफ़ाम के
हम हुए जाते हैं ख़िदमतगार-से

बेतक़ल्लुफ़ बात तो होती रही
गो कि सब थे बेमुरव्वत यार से

आदमी हर आदमी से दूर है
क्या भला उम्मीद हो परिवार से

चाँद है पीपल की टहनी पर टँगा
क्यूँ नहीं छत पर उतारा प्यार से

लुत्फ़ तो आए है तब ही इश्क़ में
जब हुई शुरुआत हो तकरार से

गर इसी रफ़्तार से चलते रहे
हम बहुत नज़्दीक होंगे दार से

मक़्ता-
एक ग़ाफ़िल हो परीशाँ क्यूँ भला
जब सभी बेख़ौफ़ हैं मझधार से

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 26, 2015

बिना आशिक़ हुए आवारगी अच्छी नहीं लगती

न दर्दे हिज़्र हो तो आशिक़ी अच्छी नहीं लगती
बिना आशिक़ हुए आवारगी अच्छी नहीं लगती

गुज़र जाता है हर इक सह्न से टेढ़ा किए मुँह जूँ
रक़ीबों को कभी मेरी ख़ुशी अच्छी नहीं लगती

बिना संज़ीदगी के काम कोई हो नहीं सकता
मगर हर बात में संज़ीदगी अच्छी नहीं लगती

मिरे गर रू-ब-रू हो चाँद भी तो अब्र के पर्दे
मुझे हर हाल में बेपर्दगी अच्छी नहीं लगती

नदी ख़ुद रोज़ आकर प्यास तो मेरी बुझा दे पर
मुझे इस मिस्ल भी दरियादिली अच्छी नहीं लगती

अगर है तिश्नगी तो ज़ब्त कर ले तू क़रीने से
नहीं मालूम क्या तश्नालबी अच्छी नहीं लगती

है मुझमें हिम्मते आग़ाज़ राहे नौ बना लूँगा
मुझे तो राह भी गुज़री हुई अच्छी नहीं लगती

भले तुह्‌मत लगे ग़ाफ़िल ज़माने से हुआ ग़ाफ़िल
मगर अख़्लाक़ पर तुह्‌मत लगी अच्छी नहीं लगती

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 23, 2015

इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

शम्‌अ की जानिब पतिंगे गर गये
लौटकर वापिस न आए मर गये

कुछ तो है पोशीदगी में बरहना
जो उसी के सिम्त पर्दादर गये

जब कभी भी प्यास जागी तो ख़याल
क्यूँ शराबे लब पे ही अक़्सर गये

मैं बताऊँ क्यूँ हुआ जी का ज़रर
वह गयी, नख़रे गये, तेवर गये

हादिसों की फ़िक़्र ऐसी या ख़ुदा?
जो न हम अब तक बुलंदी पर गये

तीर नज़रों का उसी से था चला
और हर इल्ज़ाम मेरे सर गये

एक क़त्‌आ मक़्ते के साथ-

दफ़्अतन पहुँचा तो मुझको देखकर
नोचने वाले कली को, डर गये
यूँ लगा, दिल ने कहा ग़ाफ़िल जी आप
इक ज़ुरूरी काम शायद कर गये

(पोशीदगी=छिपाव, बरहना=नग्न, पर्दादर=निन्दक, ज़रर=नुक्‍़सान, दफ़्अतन=यकबयक)

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 21, 2015

अगर दूसरों के सहारे न होते

अजी हम कभी ग़म के मारे न होते
अगर दूसरों के सहारे न होते

नदी मस्त बलखाती चलती नहीं गर
उसे थामने को किनारे न होते

फ़लक़ का ज़मीं से जो रिश्ता न होता
सितारे भी रौशन हमारे न होते

भला एक लम्हा गुज़रता तो यूँ जब
मेरे पास शिक़्वे तुम्हारे न होते

कभी भी मुहब्बत न परवान चढ़ती
जो हम जीत कर दाँव हारे न होते

ऐ ग़ाफ़िल ये मुमक़िन तो होता के हरसू
सिसकते हुए से नज़ारे न होते

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 20, 2015

हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

एक थाली गिरी है गनीमत ही हो
कोई घोड़ी चढ़ा है मुहब्बत ही हो

इसलिए भी उसे इश्क़ फ़र्मा दिया
हो न हो उसको इसकी ज़ुरूरत ही हो

हारता ही रहा मैं कि शायद सनम
इश्क़ में जीत जाना बुरी लत ही हो

सिलसिला एक कायम रहे उम्र भर
गर मुहब्बत न हो तो अदावत ही हो

लोग कहते हैं उसकी हिमाक़त मगर
या ख़ुदा ये हिमाक़त नज़ाक़त ही हो

ये हक़ीक़त बयानी भी इक चीज़ है
क्या ज़ुरूरी है सब कुछ शिक़ायत ही हो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 18, 2015

पर कभी तो मुस्कुराया कीजिए

ठीक है, गुस्सा जताया कीजिए
पर कभी तो मुस्कुराया कीजिए

चाँद कब निकलेगा है मालूम जब
वक़्त पर आँखें बिछाया कीजिए

हैं बहुत मगरूर ये पर्दानशीं
अब न इनसे लौ लगाया कीजिए

वस्ल की यह शब गुज़रती जा रही
रफ़्ता रफ़्ता दिल दुखाया कीजिए

अब नहीं है ख़ुद पे मेरा इख़्तियार
अब न मुझको आज़माया कीजिए

खिल उठेगी शर्तिया मेरी ग़ज़ल
आप इसको गुनगुनाया कीजिए

-‘ग़ाफ़िल’

शा'इरी ज़िन्दगी हुई अपनी

है यही बेश्तर कमी अपनी
शा'इरी ज़िन्दगी हुई अपनी

ख़ूँ रगों में रवाँ तो है लेकिन
ज़िन्दगी ज़ूँ ठहर गयी अपनी

आशिक़ी का ग़ज़ब करिश्मा है
अब न ढूँढे मिले हँसी अपनी

बीच सहरा सराब सी है वो
और ग़ज़ाला है तिश्नगी अपनी

बज़्म में जो तमाम रौनक़ है
रक्स करती है बेख़ुदी अपनी

क्या ख़बर थी वो झूठ की ख़ातिर
क़स्म खाएगी वाक़ई अपनी

चीख उठती है रोज़ पानी से
साँस ख़ुद घोटती नदी अपनी

यार ग़ाफ़िल ज़रा न ख़्वाब आया
के वो शौकत नहीं रही अपनी

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 14, 2015

आपकी ही तो मिह्रबानी है

यार इस मिस्ल ज़िंदगानी है
जूँ हक़ीक़त नहीं कहानी है

ख़ूँ रगों में न अब रवाँ होता
आब की ही फ़क़त रवानी है

है इज़ाफ़त जो दिल की धड़कन में
आपकी ही तो मिह्रबानी है

आज मैं तर्के मुहब्बत चाहूँ
गो के यह मह्‌ज़ बदग़ुमानी है

इक समन्दर के तिश्नगी की बात
एक दरिया से मैंने जानी है

आईने टूटते रहें क्या ग़म
आपको तो नज़र लगानी है

ठोकरों पर है ज़िन्दगी अपनी
तीर की नोक पर जवानी है

याँ तो ग़ाफ़िल न अब मिले शायद
ये ग़ज़ल आखि़री निशानी है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 12, 2015

आप सबकी है इनायत दोस्तो

आपसे कैसी शिक़ायत दोस्तो
आप सबकी है इनायत दोस्तो

बज़्म में बदनाम करना आपकी
है बहुत पहले की आदत दोस्तो

खो गया था मैं अगर जज़्बात में
आपने क्या की मुरव्वत दोस्तो

चाँद के धब्बे को केवल देखिए
आपकी है यह शराफ़त दोस्तो

आज अपना ख़ूँ नहीं अपना रहा
क्या ग़ज़ब ठहरी ज़हानत दोस्तो

एक क़ाफ़िर को लगाया है गले
एक ग़ाफ़िल से अदावत दोस्तो

-‘ग़ाफ़िल’

एक पर ग़ाफ़िल पे लानत दोस्तो

मुस्कुराने की है आदत दोस्तो
इसलिए दिल है सलामत दोस्तो

खेलना आरिज़ से ज़ुल्फ़ों को बदा
यूँ कहाँ मेरी है किस्मत दोस्तो

आदतन ही शुक्रिया बोला उसे
है मगर उससे रक़ाबत दोस्तो

साफ़ बच जाए नज़र के वार से
है किसे हासिल महारत दोस्तो

शाम मेरे साथ शब ग़ैरों के साथ
इश्क़ है या है क़यामत दोस्तो

शोख़ियां उसकी मुझे उकसा रहीं
हो न जाए कुछ शरारत दोस्तो

एक क़त्आ-

आज मुझको लोग दीवाना कहें
दिल पे है उसकी हुक़ूमत दोस्तो
था यकीं के रंग लाएगी ज़ुरूर
एक दिन मेरी मुहब्बत दोस्तो

मक़्ता-

है सरापा इश्क़ में सारा जहाँ
एक पर ग़ाफ़िल पे लानत दोस्तो

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 11, 2015

रह के पत्थर से अक्सर टकराते है

तेरे कूचे में जब भी हम जाते हैं
रह के पत्थर से अक्सर टकराते है

ख़ामख़याली के बाइस पिटता कोई
वर्ना याँ तो पत्थर पूजे जाते हैं

एक कमाए दस खाएं की आदत है
इसी लिए हम रिश्ते ख़ूब निभाते हैं

कम जोतो पर अधिक हेंगाओ के जैसे
हमको ढेरों सबक सिखाए जाते हैं

हुआ क़ाफ़िया तंग बहुत अपना यारो
मज़्बूरी में जश्ने शाम मनाते हैं

एक सुहागा सोने पर जूँ लगता है
हमको जब ग़ाफ़िल कह लोग बुलाते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, सितंबर 10, 2015

पर लगे, है ज़ुदा नहीं कोई

आज तक तो मिला नहीं कोई
पर लगे, है ज़ुदा नहीं कोई

तुझको पाऊँ या जान से जाऊँ
और अब रास्ता नहीं कोई

साँस चल तो रही है पर मुझको
बिन तेरे फ़ाइदा नहीं कोई

वक़्त रूठा तो हट गयी दुनिया
आज अपना रहा नहीं कोई

इक समन्दर की आह के आगे
अब तलक तो टिका नहीं कोई

जी जले और मुस्कुराऊँ मैं
यूँ भी ग़ाफ़िल हुआ नहीं कोई

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, सितंबर 09, 2015

हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

ज़माना कहे दिल दुखाने की रातें
हैं मेरे लिए आज़माने की रातें

बहुत ढूँढता हूँ मगर अब न मिलतीं
कहाँ खो गयीं आशिक़ाने की रातें

हज़ारों ख़ुशामद मगर रूठ जाती
हैं ख़्वाबों को मेरे सजाने की रातें

तसव्वुर में तेरे मैं ख़ुश हो तो लूँ पर
न याद आएँ गर रूठ जाने की रातें

मुझे टोकती हैं बहकने से पहले
तेरे साथ पीने पिलाने की रातें

हैं ग़ाफ़िल के सीने में रह रह के चुभतीं
तेरे हिज़्र में जी जलाने की रातें

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 08, 2015

सुकूँ के दो निवाले से मेरा बेजोड़ नाता है

अदब से आजकल जब भी कोई मुझको बुलाता है
न जाने क्यूँ मुझे अहसास होता है, बनाता है

अँधेरों से कहो के बोरिया बिस्तर समेटें अब
नही मालूम क्या मंज़र? दीया जब जगमगाता है

क़लम मेरी किसी कमज़र्फ़ शौकत पर न चल जाए
जो ख़ुद है ज़िश्तरू मुझको वही शीशा दिखाता है

हँसी तब और आती है कोई दौरे रवाँ में भी
मुझे तफ़्सील से जब इश्क़ की ख़ूबी गिनाता है

ग़रज़ इतनी ही के बेहोश को बस होश आ जाए
ग़ज़ब है लुत्फ़ आरिज़ पर कोई आँसू गिराता है

ज़माने भर की दौलत से भला क्या वास्ता ग़ाफ़िल
सुकूँ के दो निवाले से मेरा बेजोड़ नाता है

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, सितंबर 07, 2015

हमारा हुस्न से नाता बहुत है

नहीं है पास पर देखा बहुत है
हमारा हुस्न से नाता बहुत है

निशाँ यूँ ही नहीं हैं रुख पे उसके
वो जज़्बातों से टकराता बहुत है

कोई तो गुल की पंखुड़ियाँ बिछा दे
वफ़ा की राह में काँटा बहुत है

ये सच है के अँधेरों की बनिस्बत
हमें लोगों ने भरमाया बहुत है

किसी ने घाव दिल पर दे दिया था
पसे मुद्दत भी वो रिसता बहुत है

मैं कैसे चाह कर उसको भुला दूँ
कभी वह भी हमें चाहा बहुत है

जो उलझी थीं लटें तूफ़ाँ में पहले
कोई रह रह के सुलझाता बहुत है

ये ग़ाफ़िल बे सबब शा'इर हुआ क्या?
यहाँ पर हुस्न की चर्चा बहुत है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, सितंबर 06, 2015

फ़र्ज़ निस्बत का भला कुछ तो अदा कर जाते

दोस्ती निभ न सकी बैर निभा कर जाते
फ़र्ज़ निस्बत का भला कुछ तो अदा कर जाते

इक तक़ाज़ा था नहीं तुमने ज़रा ग़ौर किया
बात बनती ही अगर बात बना कर जाते

दूर जाना ही रहा दिल से तो आए थे क्यूँ
और गर आ ही गए थे तो बता कर जाते

एक अर्से से किसी ने तो न छेड़ा दिल को
तुमसे उम्मीद जगी थी तो सता कर जाते

रू-ब-रू था तो मगर कुछ भी नहीं बोल सका
तुमपे यह फ़र्ज़ रहा मुझको बुला कर जाते

एक ग़ाफ़िल से भला इस भी क़दर शर्माना
मुस्कुरा करके कभी आँख मिला कर जाते

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, सितंबर 05, 2015

उसे है कारवाँ मिलता भले तन्‌हा निकलता है

यूँ राहे ज़ीस्त में इंसान गर सच्चा निकलता है
उसे है कारवाँ मिलता भले तन्‌हा निकलता है

मेरी पुरख़ार राहें एक दिन फूलों भरी होंगी
पता है ख़ार में भी किस तरह गुंचा निकलता है

किया क्या ग़ौर इस पर भी किसी ने क्यूँ है ऐसा के
निकलता चाँद मश्‌रिक़ से है जब पूरा निकलता है

जहाँ में इश्क़ का दीया है जब भी बुझ रहा होता
किसी मीरा दीवानी का वो गोपाला निकलता है

बहुत था दर्द दिल में साथ जब तू थी नहीं मेरे
तेरे आने से देखूं दर्द अब कितना निकलता है

तुझे क्यूँ फ़िक़्र है तीरे नज़र का वार जिस पर की
वही ग़ाफ़िल, जो तेरे दर से मुस्काता निकलता है

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, सितंबर 04, 2015

ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

आपने कुछ जो कह दिया होगा
ज़ख़्म सीने का फिर हरा होगा

बात फिर इश्क़ की चली होगी
फिर रक़ाबत का सिलसिला होगा

मैंने सोचा तो नहीं था हरगिज़
दिल के लुटने का हादिसा होगा

गो मैं छू भी नहीं सकूँ फिर भी
चाँद तो छत पे आ गया होगा

जल रहे आज जो रक़ीब मेरे
नाम उसने मेरा लिया होगा

लाख मुझसे हिज़ाब कर ले वो
आईने से न कुछ छुपा होगा

दिल लुटाने का ढब नहीं अब तक
इश्क़बाज़ी में वह नया होगा

ताब उसके शबाब का ग़ाफ़िल
आईना ख़ाक सह सका होगा

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, सितंबर 01, 2015

इस तरह ख़ुद को सताने से भला क्या हासिल

बात सीने में दबाने से भला क्या हासिल
इस तरह ख़ुद को सताने से भला क्या हासिल

एक सैलाब भी है प्यास भी तो ज़ाहिर है
आँख अब और चुराने से भला क्या हासिल

होश को जोश गर आ जाय तो मुमक़िन है सब
जोश में होश गवाने से भला क्या हासिल

आईना ख़ूब ही जाने है हक़ीक़त तेरी
उसको बन ठनके रिझाने से भला क्या हासिल

जाम होंटों का कोई चख के यही सोचेगा
मै को अब हाथ लगाने से भला क्या हासिल

इश्क़ नेमत है अगर यह न हुआ हासिल तो
सोच ग़ाफ़िल है ज़माने से भला क्या हासिल

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 31, 2015

या फ़साना ही सुनाए बरगलाने के लिए

फिर कोई इक गीत गाए जी जलाने के लिए
या फ़साना ही सुनाए बरगलाने के लिए

आशिक़ी के नाम पर उसने फ़क़त इतना कहा
क्या भला मैं ही मिला था आज़माने के लिए

इस क़दर रुस्वा हुआ हूँ शह्र में के अब मुझे
हो रही तर्कीब क्या क्या भूल जाने के लिए

होश आया तो मैं जाना मैकशी क्या चीज़ है
एक यह जुम्ला बहुत है होश आने के लिए

सोचता हूँ ग़म में तेरे हो गया मैख़ोर पर
और भी हिक़्मत तो होगी ग़म मिटाने के लिए

इक ज़माना था के जब होती क़वायद शामो शब
छत पे आए चाँद का दीदार पाने के लिए

काश हो जाता कहीं ऐसा के हर बंदिश को तोड़
फिर चला आता कोई मुझको सताने के लिए

मैंने पूछा किस लिए यूँ हुस्न बे पर्दा हुआ
दफ्अतन बोला गया ग़ाफ़िल ज़माने के लिए

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 29, 2015

सारे मेरे तन के छाले हैं साहिब

जो भी दिखते काले काले हैं साहिब
सारे मेरे तन के छाले हैं साहिब

किसको है मालूम कि हम इन हाथों से
चावल भूसी साथ उबाले हैं साहिब

रात गयी सो बात गयी की तर्ज़ पे हम
सह सह करके सदियां टाले हैं साहिब

तीरे नज़र चलाकर फिर मुस्का देना
आपके ये अंदाज़ निराले हैं साहिब

आप लड़ाओ पेंच न हमको पता चले
क्या हम इतने भोले भाले हैं साहिब

ग़ाफ़िल को चलना ही केवल सिखला दो
उड़ने को यूँ भी परवाले हैं साहिब

-’ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 27, 2015

मुझसे जो इंतक़ाम है तेरा

आजकल ख़ूब नाम है तेरा
मुझसे जो इंतक़ाम है तेरा

इश्क़ रुस्वा न मेरा हो जाए
शह्र में चर्चा आम है तेरा

याद तेरी कहाँ से आती है
अब कहाँ पर मक़ाम है तेरा

जाम का वक़्त और ये पर्दा
किस तरह इंतज़ाम है तेरा

इल्म कैसे हो कौन बतलाए
है, मगर कब पयाम है तेरा

जो भी ग़ाफ़िल हैं सब परीशाँ हैं
इस क़दर तामझाम है तेरा

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 25, 2015

इश्क़ वह शै है करेगा तो सँवर जाएगा

दौरे रफ़्तार में तू जब भी जिधर जाएगा
ख़ौफ़ का एक तमाशा सा उधर जाएगा

अज़्नबी खाये है वैसे भी सफ़र में ठोकर
क्या क़सर हो कि तू पीकर भी अगर जाएगा

हुस्न धोखा है, नहीं इस पे भरोसा करना
वह जताएगा न जाएगा मगर जाएगा

एक आवाज़ सी आती है मिरे अन्दर से
इश्क़ वह शै है करेगा तो सँवर जाएगा

फलसफा ज़ीस्त का चलना है अँधेरे में जूँ
गरचे हिम्मत भी गयी डर के ही मर जाएगा

राह फिर रोक न ले शोख़ तमन्ना ग़ाफ़िल
सोच गर यूँ ही हुआ तो तू किधर जाएगा

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 24, 2015

ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं

बड़बोलापन जिनके अन्दर देखे हैं
रोते धोते उनको अक़्सर देखे हैं

आँख लड़ाई में जाने कितनों की ही
टूटी टाँगें औ फूटा सर देखे हैं

लुटे पिटे आशिक़ बहुतेरे गलियों से
मुँह लुकुवाए लौटे हैं घर देखे हैं

हुए लफ़ंगे खाते पीते घर वाले
कई लफ़ंगे हुए कलंदर देखे हैं

बग़िया में कोई वह्‌शी घुस आया था
छितराए चिड़ियों के पंजर देखे हैं

अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे रस्ता पूछें
राह बताते अक्सर चोन्हर देखे हैं

मुरहे लड़के ही पिटते हैं लेकिन हम
आग लगाते हुए सुख़नवर देखे हैं

खीस निपोरे बिल्ली, गुर्राते चूहे
ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अगस्त 23, 2015

आप जैसा मुझे सोचता कौन है

अब सिवा आपके आश्ना कौन है
आप जैसा मुझे सोचता कौन है

साथ देने को राज़ी हज़ारों हैं पर
मैं न जानू के वा’दावफ़ा कौन है

कर रहे हैं नुमाइश सरेआम सब
जानकर भी के दिल लूटता कौन है

याद में डूबने का है दावा महज़
वाक़ई याद में डूबता कौन है

आदमी को ख़ुदा मिल तो जाये मगर
आजकल टूटकर चाहता कौन है

मैं हूँ ग़ाफ़िल नहीं इल्म मुझको ज़रा
कौन है तल्ख़ औ चटपटा कौन है

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अगस्त 19, 2015

टूटता है जो कभी दर्द वो क्या देता है

अश्क बह जाय तो फिर ख़ूब मज़ा देता है
बात यह और है, औरों को रुला देता है

चाँद आँखों मे मेरे ख़्वाब नये रख जाता
और सूरज है मेरा ख़्वाब जला देता है

क़त्ल हो जाऊँ इशारा ही तेरा काफी था
तू तो हर बात में नश्तर ही चुभा देता है

वज़्न खीसे का मेरा और शराब की क़ीमत
देख, महबूब नज़र से ही पिला देता है

ये अदा भी क्या अदा है न समझ पाऊँ मैं
बात करता है वो, अहसान जता देता है

चूड़ियाँ चुभके हमेशा ही यही बतलायें
टूटता है जो कभी दर्द वो क्या देता है

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 18, 2015

आप सबको मेरी बन्दगी दोस्तों

आपसे है मेरी हर ख़ुशी दोस्तों
आप सबको मेरी बन्दगी दोस्तों

अनकही सी इबारत है तक़्रीर अब
क्या खिलाती है गुल आशिक़ी दोस्तों

अश्क हैं तो है ज़िन्दा ज़मीर आपका
है ज़मीर आपका, ज़िन्दगी दोस्तों

आपने कह दिया, यह बड़ी बात है
बात गोया ज़रा सी  ही थी दोस्तों

हुस्न का नाज़ सर पे उठाए फिरे
देखिए इश्क़ की सादगी दोस्तों

इसलिए भी सभी लुत्फ़ हैं ले रहे
शा’इराना जो है बेख़ुदी दोस्तों

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 17, 2015

नफ़्रतों का कारवाँ पुरख़ार इक रस्ता मिला

क्या बताऊँ इश्क़ में तेरे मुझे क्या क्या मिला
नफ़्रतों का कारवाँ पुरख़ार इक रस्ता मिला

इश्क़ है अंधे कुएँ में कूद जाना शौक से
आशिक़ी के दौर में यह इक सबक अच्छा मिला

आबलों के पा लिए मैं चल रहा था ख़ार पर
या ख़ुदा यह क्या? के अब सूना सा चौराहा मिला

शह्र पहचाना सा है पर अज़्नबी सी भीड़ है
पागलों सा ढूँढता हूँ इक न तेरे सा मिला

हुस्न जब पर्दे में था क्या शौक था के देख लूँ
हुस्न से पर्दा उठा तो लुत्फ़ भी जाता मिला

सोचता ग़ाफ़िल है के कुछ भी न मिलता फ़र्क़ क्या
क्या मिला तू मिल न पाया जो मिला वादा मिला

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अगस्त 16, 2015

सुलगता सा हमारे दिल में भी कोई शरारा है

तुम्हारे पास झूठी शेखियों का गर पिटारा है
सुलगता सा हमारे दिल में भी कोई शरारा है

लुटेरे इस वतन के ही रहे हैं लूट अब अस्मत
सुनी क्या चीख? भारत माँ ने फिर हमको पुकारा है

के डालो फूट और शासन करो की नीति देखो अब
बदल कर रूप भारत में उठाई सर दुबारा है

सबक सीखें भला बीते हुए लम्हों से हम कैसे
कभी मुड़ कर के देखें हम, नहीं हमको गवारा है

हैं भारत माँ के जो लख़्ते जिगर सोए हुए हैं सब
कोई थककर है सोया और किसी का ड्रग सहारा है

तमाशा रोज़ का है गर कहे तो क्या कहे ग़ाफ़िल
कोई है हार कर जीता कोई जीता तो हारा है

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 15, 2015

आईने जो हक़ीक़त दिखाते रहे

वो हमीं को पहाड़ा पढ़ाते रहे
हम जिन्हें अपना नेता बनाते रहे

माल हमरा सियासत उड़ाती रही
और हम ख़्वाब बैठे सजाते रहे

देश के नाम पर हम हमारा लहू
भेड़ियों को ही शायद पिलाते रहे

भूख का, रोग का रक्स होता रहा
हम हैं आज़ाद, हम गीत गाते रहे

देखिए नाच गाकर शहीदों को भी
हम अभी तक ग़ज़ब बरगलाते रहे

हम हैं ग़ाफ़िल तो क्यूँ देख लेते भला
आईने जो हक़ीक़त दिखाते रहे

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 13, 2015

अब भड़कना चाहिए था पर शरारे मौन हैं

देखकर दुनिया की ज़िल्लत चाँद तारे मौन हैं
अब भड़कना चाहिए था पर शरारे मौन हैं

नक़्ल में मग़्रिब के मश्रिक़ बेतरह अंधा हुआ
हुस्न बेपर्दा हुआ है और सारे मौन हैं

तीर तरकश में छुपा, ख़ामोश है बन्दूक भी
लुट रही हैं अस्मतें माँ के दुलारे मौन हैं

क्या तबस्सुम था बला का क्या अदा की चाल थी
उस नज़ाकत औ नफ़ासत के नज़ारे मौन हैं

देखिए रुकने न पाए अपने सपनो की उड़ान
फ़िक़्र क्या जो हौसिल: अफ़्ज़ा हमारे मौन हैं

बोलता रहता है ग़ाफ़िल दिल से जो मज़्बूर है
फिर नदी से चीख उभरी फिर किनारे मौन हैं

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, अगस्त 12, 2015

हमें काँटों भरी राहों पे चलना भी ज़ुरूरी था

हमारे जी में कोई ख़्वाब पलना भी ज़ुरूरी था
दिले नादान को उस पर मचलना भी ज़ुरूरी था

किसी की शोख़ियों ने क्या ग़ज़ब का क़ह्र बरपाया
ज़रर होने से पहले ही सँभलना भी ज़ुरूरी था

ये तन्हाई हमारी पूछती रहती है अक्सर के
जो अब तक साथ थे क्या उनका टलना भी ज़ुरूरी था

इरादा तो ज़ुरूरी था ही मंज़िल तक पहुँचने को
हमें काँटों भरी राहों पे चलना भी ज़ुरूरी था

ज़माने का नया अंदाज़, हम रुस्वा न हो जाएँ
इसी बाइस नये फ़ैशन में ढलना भी ज़ुरूरी था

रहे पुरख़ार पर चलता रहा ग़ाफ़िल ज़माने से
ज़रा आराम आए रह बदलना भी ज़ुरूरी था

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 11, 2015

साथ हमको सनम आपका चाहिए

212 212 212 212

एक अहदे वफ़ा अब हुआ चाहिए
साथ हमको सनम आपका चाहिए

अब तलक ख़ूब लू के थपेड़े सहे
चाहिए बस हमें अब सबा चाहिए

ज़ह्र से हों भरी या के शीरींअदा
आपसे बात का सिलसिला चाहिए

ज़ीनते बज़्म कायम रहे इसलिए
आपके रुख़ से पर्दा हटा चाहिए

इश्क़ के हर्फ़ से हम हैं अंजान पर
आशिक़ों का हमें मर्तबा चाहिए

हुस्न रूठा तो क्या इश्क़ रुश्वा न हो
बस यही आपकी इक दुआ चाहिए

क्या थिरकने लगे यह हमारी ग़ज़ल
इक दफा आपका मर्हबा चाहिए

कुछ मिला तो भला, नफ़्रतें ही सही
एक ग़ाफ़िल को अब और क्या चाहिए

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 10, 2015

माल हम बेमिसाल रखते हैं

2122 1212 22

आर्ज़ू बाकमाल रखते हैं
माल हम बेमिसाल रखते हैं

है हमें इश्क़ का लिहाज़ ज़रा
यूँ तो हम भी सवाल रखते हैं

बचके जाए न एक भी मछली
इश्क़ का हम वो जाल रखते हैं

लुत्फ़ है यह के आपने जो कहा
हुस्न को हम सँभाल रखते हैं

आप ख़ुद को भी भूल जाएँ पर
हम तो सबका ख़याल रखते हैं

सादगी देखिए तो, हम ग़ाफ़िल
दिल जलाकर मशाल रखते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

देखिए हम रिंद फिर पीने पिलाने आ गये

2122 2122 2122 212

हुस्न वाले अक़्ल फिर अपनी लगाने आ गये
इश्क़ को बच्चा सरीखे बरगलाने आ गये

हो गयी है शाम अब शेरो सुखन की यह शराब
देखिए हम रिंद फिर पीने पिलाने आ गये

इश्क़ की आँधी चली तो हुस्न के हर पेचो ख़म
क्या बताएँ यार ख़ुद कैसे ठिकाने आ गये

भूल करके देर तक हम रह सकें, मुमकिन नहीं
आपकी यादों के मेले फिर बुलाने आ गये

इश्क़ की बेताबियाँ कुछ इस क़दर तारी हुईं
कौन भेजे ख़त उन्हें हम ख़ुद बताने आ गये

कौन सुनता है यहाँ अपने में हैं मश्ग़ूल सब
अब न जाने क्यूँ लगे हम क्यूँ सुनाने आ गये

इश्क़ में बेआबरू होने का मतलब कुछ नहीं
हम फ़क़त अपनी वफ़ाएँ आज़माने आ गये

हुस्न वालों के ये नख़रे औ नज़ाक़त बाप रे!
फिर भी देखो हम-से ग़ाफ़िल सर ख़पाने आ गये

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, अगस्त 07, 2015

अगर दिल हों मिले तो फ़ासिला क्या

१२२२ १२२२ १२२

न हो दिल में कसक तो राब्ता क्या
अगर दिल हों मिले तो फ़ासिला क्या

मुझे गुमसुम सा देखा पूछ बैठे
तिरा भी इश्क़ का चक्कर चला क्या

किसी के ख़्वाब में खो सा गया हूँ
इसे मैं मान बैठूँ हादिसा क्या

मिरी आँखों से आँसू जब गिरे तो
सभी पूछे कोई तिनका पड़ा क्या

बड़ी परहेज़गारी की थी शुह्रत
नशे में शेख़ जी हैं ये हुआ क्या

कई बच तो गये शमशीर से भी
नज़र की तीर से कोई बचा क्या

जो ज़ीनत थी तिरे घर की गयी अब
नशे की हाल में फिर ढूँढता क्या

यूँ ज़ेरे ख़ाक हो करके भी ग़ाफ़िल
हुआ अब वाक़ई तुझसे ज़ुदा क्या

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, अगस्त 06, 2015

आपका यह हुस्न मैखाना हुआ

इक मुसाफ़िर राह का माना हुआ
आपके कूचे में बेगाना हुआ

चल रही थीं आँधियाँ बिखरे थे फूल
आज मेरा गुलसिताँ जाना हुआ

कैद हो जाना है भौंरे का नसीब
फिर कमलनी का वो दीवाना हुआ

इक शज़र से बेल लिपटी देखकर
क्या कहूँ क्या उनका शर्माना हुआ

क्या मचलती है नदी इक बारगी
जब किसी सागर से मिल जाना हुआ

हुस्न क्या है एक है यह भी सवाल
सच बताना क्या बता पाना हुआ

चाँद आया छत पे तो मचला है जी
क्या हसीं क़ुद्रत का नज़राना हुआ

एक ग़ाफ़िल का किया ख़ानाख़राब
आपका यह हुस्न मैखाना हुआ

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, अगस्त 04, 2015

ज़ुरूरत है मुहब्बत का तराना गुनगुनाने की

1222 1222 1222 1222

ज़ुरूरत है मुहब्बत का तराना गुनगुनाने की
हर इक सोए हुए जज़्बात को फिर से जगाने की

बहुत बेताब हो जाता हूँ नख़रों से तिरे हमदम
मुझे अब मार डालेगी अदा ये रूठ जाने की

मैं कितनी बार बोला के तुझी से प्यार है जाना
तुझी से प्यार है कहने को तू कितने बहाने की

जो इतनी गर्मजोशी है बहुत मुमकिन है यारों ने
नयी तरक़ीब सोची है मुझे फिर से फसाने की

तुझे मालूम क्या? क्या-क्या नहीं ताने सहा हूँ मैं
मगर आदत नहीं जाती है अब पीने-पिलाने की

हुई शादी तो बेताबी भी क्यूँ जाती रही ग़ाफ़िल
वही जी! चाँद तारों से कोई दामन सजाने की

-‘ग़ाफ़िल’

सोमवार, अगस्त 03, 2015

दार है अब कहाँ रिहाई है

हुस्न ने की जो बेवफ़ाई है
इश्क़ की आबरू पे आई है

उसका पीछा नहीं मैं छोड़ूंगा
क्या करूँ दिल पे चोट खाई है

आज गुस्ताख़ हो न जाऊँ मैं
वह जो नाज़ो अदा से आई है

हुस्न वालों का यक़ीं मत करना
इनकी फ़ित्रत में बेवफ़ाई है

आज देखा तो चाँद छत पर था
या ख़ुदा क्या तिरी ख़ुदाई है

ज़ुल्फ़े ज़िंदाँ में कैद हूँ अब तो
दार है अब कहाँ रिहाई है

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, अगस्त 02, 2015

देखिए क्या था मैं और क्या रह गया

एक मंज़िल था अब रास्ता रह गया
देखिए क्या था मैं और क्या रह गया

ख़त से मज़मून सारे नदारद हुए
अब लिफ़ाफ़े पे केवल पता रह गया

घर के अफ़्राद जाने कहाँ खो गए
मैं ही तस्वीर सा बस सजा रह गया

इस क़दर हैं ज़माने की ख़ुदग़र्ज़ियाँ
गो के ज़र से ही बस वास्ता रह गया

आईने का वो गुस्सा अरे बाप रे!
उसको देखा तो बस देखता रह गया

आपने बज़्म से जब उठा ही दिया
अब मुझे और कहने को क्या रह गया

कौन है मेरी बर्बादियों का सबब
सोचने जो लगा सोचता रह गया

आज ग़ाफ़िल पे तुह्‌मत लगी है के वो
बज़्म में बेवजह बोलता रह गया

-‘ग़ाफ़िल’

शनिवार, अगस्त 01, 2015

अब किताबों में पड़े ख़त मुँह चिढ़ाने लग गए

फिर रक़ीबों को मिरे यूँ मुँह लगाने लग गए
आप फिर से क्यूँ मुझे ही आज़माने लग गए

क्या पता है आपको मैंने किए क्या क्या जतन
आपको अपना बनाने में ज़माने लग गए

एक अर्सा हो गया आए हुए ख़त आपका
अब किताबों में पड़े ख़त मुँह चिढ़ाने लग गए

आप दुश्मन के यहाँ जाने लगे हैं आदतन
यूँ मुझे बर्बादियों के ख़्वाब आने लग गए

आपकी इस बेरुख़ी ने बेतरह डाला असर
अब मेरी आँखों में तारे झिलमिलाने लग गए

मेरे अश्कों में थी ग़ैरत गिरके कहलाए गुहर
आपके पल्लू में जा वाज़िब ठिकाने लग गए

इस तरह से इश्क़ का अपने हुआ है हश्र क्यूँ
आपसे पूछा तो अपना सर खुजाने लग गए

क्या करे ग़ाफ़िल भला यूँ राह कुछ सूझे नहीं
रहनुमा थे जो कभी अब बरगलाने लग गए

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जुलाई 31, 2015

आप बन ठनके जो निकलते हैं

आप बन ठनके जो निकलते हैं
यूँ भी सौ आफ़्ताब जलते हैं

अब्र शर्माए सिमट जाए जब
ज़ुल्फ़ लहराके आप चलते हैं

जाम आँखों का आपकी पीकर
याँ तो आशिक़ हज़ार पलते हैं

क्या क़शिश है के जी जला कर हम
आपके इश्क़ में पिघलते हैं

लोग बदनाम ही किए फिर भी
हम तो आशिक़ हैं हम मचलते हैं

जी तड़पता है बहुत तब ग़ाफ़िल
आप पहलू से जब भी टलते हैं

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 30, 2015

अपने हिस्से का सारा संसार लिखो

कौन भला कहता है अब मत प्यार लिखो
अपने हिस्से का सारा संसार लिखो

गोया हमले हर सू से होते हैं पर
इश्क़ नहीं मर सकता, बारम्बार लिखो

गमे इश्क़ भी सबको हासिल होता क्या
इश्क़ नहीं होता है सर का भार लिखो

इश्क़ नहीं तो क्या खोया औ क्या पाया
इश्क़ बिना हर शै होती बेकार लिखो

पूरी क़ायनात के हर बासिन्दे को
सच्ची उल्फ़त की होती दरकार लिखो

इश्क़ मता-ए-कूचा मत समझे कोई
ख़ाक सजाएगा इसको बाज़ार लिखो

रोटी खाओ ख़ुदपसन्द की बेशक तुम
बात मुनासिब जो हो मेरे यार लिखो

पत्थरदिल जब तक बन मोम न बह जाए
लिक्खो ग़ाफ़िल तब तक तुम अश्‌आर लिखो

-‘ग़ाफ़िल’

बुधवार, जुलाई 29, 2015

ग़ज़ल : ख़ुद की तक़्दीर यूँ आज़माते रहे

**********************************************
बहर-
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

मापनी-
212 212 212 212
**********************************************

आप रूठा किए हम मनाते रहे
ख़ुद की तक़्दीर यूँ आज़माते रहे

आप उठकर गए रूठ किस्मत गयी
हम अकेले ही आँसू बहाते रहे

वस्ल के गीत लिखता मगर आप ही
हिज़्र के गीत हमसे लिखाते रहे

आपको क्या के हम हैं परीशाँ बहुत
आप जाते रहे मुस्कुराते रहे

कुछ बढ़ी हैं हमारी यूँ दुश्वारियाँ
ख़्वाब जो आप हमको दिखाते रहे

दो क़दम ही निभाना था गर साथ तो
मंज़िलों का पता क्यूँ बताते रहे

-‘ग़ाफ़िल’
**********************************************

सोमवार, जुलाई 27, 2015

आग भड़के के तभी आग बुझा दी किसने

ग़ज़ल-

2122 1122 1122 22 (112)

फ़ाइलातुन  फ़ियलातुन  फ़ियलातुन  फ़ैलुन (फ़अलुन)

क़ाफ़िया- आ
रदीफ़-  दी किसने
@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

इश्क़ है आग का दरिया की मुनादी किसने
आग भड़के के तभी आग बुझा दी किसने

है पता आग की लज़्ज़त का मुझे पहले से
या ख़ुदा इश्क़ में जाने की सज़ा दी किसने

एक यह बात के मुझ पर न यक़ीं था उसको
और भी मेरे तईं आग लगा दी किसने

उड़ रहे अब्र तो है जी भी परीशाँ यह के
ज़ुल्फ़ महबूब की इस मिस्ल उड़ा दी किसने

इश्क़बाज़ी का सफ़र ख़ूब था जारी लेकिन
अब रहे इश्क़ में भी कील बिछा दी किसने

होंठ सूखे थे तलब थी तो फ़क़त पानी की
आबे अह्‌मर ही मुझे लब की पिला दी किसने

आबे अह्‌मर=ख़ास लाल शराब

-‘ग़ाफ़िल’

@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

रविवार, जुलाई 26, 2015

क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

आपके सिम्त आया था क्या देखकर
हूँ मैं हैरान उल्टा हुआ देखकर

आपके मैकदे की हो जो भी सिफ़त
क्या मज़ा आपका चेहरा देखकर

जी मेरा भी नशीला हुआ जा रहा
आपके लड़खड़ाते ये पा देखकर

क्या कहूँ किस कदर होश मेरा गया
आपको होश से लापता देखकर

आपका हो गया आज मुश्ताक़ मैं
आपके मैकशी की अदा देखकर

मर्हबा मर्हबा मर्हबा मर्हबा
मैं रटूं आपका सर फिरा देखकर

शनिवार, जुलाई 25, 2015

ज़ेब कोई सिली नहीं होती

तू अगरचे कही नहीं होती
बात इतनी लगी नहीं होती

होश आया तो मैंने जाना के
ज़िन्दगी मैकशी नहीं होती

बात बातों में रूठना तेरा
यूँ सनम आशिक़ी नहीं होती

मुझसे जलता न ज़माना गर तू
मुस्कुराकर मिली नहीं होती

चश्म मे तू न ठहरती मेरे
तो मिरी किरकिरी नहीं होती

गर तिरे दर से गुज़रती न कभी
यूँ हवा संदली नहीं होती

पी रहा मैं शराब होंठों की
मैकशी भी बुरी नहीं होती

आज ग़ाफ़िल को यूँ न बहका तू
ज़ेब कोई सिली नहीं होती

शुक्रवार, जुलाई 24, 2015

अरे हुस्न वालों ये क्या माज़रा है

न कोई है शिक़्वा न कोई सिला है
अरे हुस्न वालों ये क्या माज़रा है

मुझे क्या पता था मुझे मार देगा
निगाहों का तेरे जो ख़ंजर चला है

हुआ तो हुआ पर हुआ क्या यहाँ जो
थी बरसात होनी कुहासा हुआ है

मिरे खेत में अब न बरसेंगी ऐसा
फुहारों ने शायद किया फ़ैसला है

मिले यार सच्चा तो यूँ भी समझ ले
ज़माने की इश्रत तुझे ही अता है

हुआ एक अर्सा मुझे पौध रोपे
बड़ा नकचढ़ा फूल है अब खिला है

मिरे दिल के हर जख़्म से जाने जाना
नहीं मैं कहूँगा तेरा राब्ता है

कली की सदा कौन सुनता है ग़ाफ़िल
उसे तोड़कर देख सेह्रा सजा है

-'ग़ाफ़िल'

गुरुवार, जुलाई 23, 2015

लिहाजा अब ज़रा ख़ूने जिगर की बात करते हैं

तुम्हारी बेरुख़ी है जो हजर (पत्थर) की बात करते हैं।
वगरना बारहा हम तो क़मर (चाँद) की बात करते हैं।।

हमारे खेत में है लहलहाती फ़स्ल ग़ज़लों की,
हमारे गाँव वाले अब बहर की बात करते हैं।

सलीका है नहीं जिनको वफ़ादारी निभाने का,
वही हमसे मुहब्बत के हुनर की बात करते हैं।

कभी दिल चाक कर देते हैं वो बेबाक लहजे से,
कभी मासूमियत से चश्मे तर की बात करते हैं।

जिन्हें फ़ुर्सत नहीं अपने हरम से दूर जाने की,
वही ऐयाश राहे पुरख़तर की बात करते हैं।

ज़माने की हसीं बातों से होना कुछ नहीं हासिल,
लिहाजा अब ज़रा ख़ूने जिगर की बात करते हैं।।

-‘ग़ाफ़िल’

मंगलवार, जुलाई 21, 2015

मुस्कुरा कर हमें आजमाने लगे

जब हमारी गली से वो जाने लगे।
मुस्कुरा कर हमें आजमाने लगे।।

अब उन्हें भी जफ़ा का मिलेगा सिला,
हम उन्हें रफ़्ता रफ़्ता भुलाने लगे।

आँधियों से तो लड़ती शम्‌आ क़ुफ़्र यह,
के पतंगे आ ख़ुद को जलाने लगे।

गीत गाया किए वो मुहब्बत का, पर
जाने क्यूँ हमको झूठे फ़साने लगे।

दिल की बस्ती में सैलाब सा आ गया,
चश्म दो जब भी आँसू बहाने लगे।

साथ देता है ग़ाफ़िल भला कौन? जब
कोई, मज़्बूर दिल को सताने लगे।।

रविवार, जुलाई 19, 2015

ख़ुदा ही कुछ करे के मार्फ़त अंजाम हो जाए

हमारी क़ब्र पर आना जो तेरा आम हो जाए।
हमारी रूहे फ़ानी को ज़रा आराम हो जाए।।

हमारा क़त्ल करके इस क़दर तू मुस्कुराए है,
किसी शातिर का जैसे कोई भारी काम हो जाए।

हमारा जिस्म ज़ेरे ख़ाक है पर रूह ज़िन्दा है,
न ऐसा काम कर के वह भी अब बदनाम हो जाए।

अगर वादा खि़लाफ़ी ही मुहब्बत की रवायत है,
तो चाहूँ के हमारा इश्क़ अब नाकाम हो जाए।

हुई क्या बात के अहले ज़माना हो गया दुश्मन,
किया है इश्क़ ही तो और न इल्ज़ाम हो जाए।

बड़ा ही पुरख़तर है काम ग़ाफ़िल इश्क़बाजी, अब
ख़ुदा ही कुछ करे के मार्फ़त अंजाम हो जाए।।

शुक्रवार, जुलाई 10, 2015

आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

सांस मेरी थमी की थमी रह गई
आँख तुझपे जमी की जमी रह गई

यूँ के दीदार तेरा हुआ क्या सनम
जान की जो पड़ी तो पड़ी रह गई

जाम आँखों से तूने पिलाया मगर
लब तड़पते रहे तिश्नगी रह गई

नीमकश तीर दिल में उतरता रहा
यूँ ख़लिश भी हुई ज़िन्दगी रह गई

वास्ता इश्क़ का देने वाला गया
हुस्नवाली ठगी की ठगी रह गई

वह के तूफ़ाँ सा आया चला भी गया
जी में इक धुंध सी बेकली रह गई

रविवार, जुलाई 05, 2015

रखता है याद कोई याँ किसकी बेबसी को

यह ज़ीस्त जलाती है सौ बार आदमी को।
पर आदमी न समझे इक बार ज़िन्दगी को।।

बहती है कू-ब-कू जो पानी के मिस्ल मै अब,
फिर क्यूँ न सांप सूंघे परिवार की ख़ुशी को।

लैला-ओ-कैस फिर से आ जाएँ गर ज़मीं पर,
मिल जाय खाद पानी मुरझाई आशिक़ी को।

मेरे हरेक ख़त पर लब की मुहर लगाकर,
मेरी मुहब्बतें वह भेजेगी फिर मुझी को।

वह नज़रे क़यामत से देखे मुझे के देखूँ,
लगती नहीं नज़र है कब तक तिरी हंसी को।

ये शे’रो सुखन ग़ाफ़िल हैं दिल्लगी की बातें,
रखता है याद कोई याँ किसकी बेबसी को।।

शनिवार, जुलाई 04, 2015

मिरे वास्ते आखि़री रात होगी

न जिस रात तुझसे मुलाक़ात होगी।
मिरे वास्ते आखि़री रात होगी।।

बहुत हो चुकी गुफ़्तगू होश में अब,
चलो मैक़दे में वहीं बात होगी।

बहारों ने फिर से सजायी है महफ़िल,
शरारों की फिर से ख़ुराफ़ात होगी।

तिरे चश्म का तीर मुझको लगा तो,
ये मेरे लिए तेरी सौगात होगी।

ग़ज़ब है उमस और बिजली भी गुम है,
न कुछ है अंदेशा के बरसात होगी।

तुझे रंज था के मैं बोलूँ हूँ ज़्यादा,
तो अब गोर में हूँ न कुछ बात होगी।।

शुक्रवार, जुलाई 03, 2015

कितना एहसान यार करता है

मुझपे वह जाँ निसार करता है।
यूँ मुझे शर्मसार करता है।।

खेँच लेता है ख़ून रग रग से,
वक़्त जब भी शिकार करता है।

रख लिया मुझको हाशिए पे सही,
कितना एहसान यार करता है।

आईना देखकर मेरी सूरत,
रोज़ चीखो पुकार करता है।

याद आकर वो क्यूँ शबे हिज़्राँ,
जी मेरा बेक़रार करता है।

सो जा ग़ाफ़िल न अब वो आएगा,
तू जिसका इंतज़ार करता है।।

-‘ग़ाफ़िल’

गुरुवार, जुलाई 02, 2015

भड़कता है कभी शोला किसी के मुस्कुराने से

नहीं चैनो क़रार आए है तेरे रूठ जाने से।
सनम तू लौट के आ जा भले झूठे बहाने से।।

ख़ुतूतों का वो लम्बा सिलसिला जाता रहा तो क्या?
महक़ते हैं किताबों में अभी तक ख़त पुराने से।

लिखा करता था जिसको ख़त पढ़ा करता था जिसका ख़त,
बड़ी तक़लीफ़ होती है उसी के भूल जाने से।

भड़कना ही रही फ़ित्रत तो सीने में भड़क जाता,
शरारा क्या हुआ हासिल मिरे घर को जलाने से।

कोई मुस्कान सीने की अगन पल में बुझा देवै,
भड़कता है कभी शोला किसी के मुस्कुराने से।

निराला फ़न ग़ज़लगोई जो चाहे बात कह ग़ाफ़िल,
ग़ज़ब का लुत्फ़ आता है ग़ज़ल इक गुनगुनाने से।।

सोमवार, जून 29, 2015

अगरचे शह्र में बदनाम अपनी आशिक़ी होती

जो तेरे हुस्न मेरे इश्क़ की खिचड़ी पकी होती।
न भूखा मैं पड़ा होता न भूखी तू पड़ी होती।।

हुआ बर्बाद मैं तेरी ही सुह्बत में ऐ जानेमन!
तुझे गर यह ख़बर होती तुझे कितनी ख़ुशी होती।

मुझे ग़ाफ़िल ही कहकर बज़्म में अपनी बुला लेती,
न पड़ता फ़र्क़ कोई बस ज़रा सी दिल्लगी होती।

मुझी से गुफ़्तगू में वह बला की शर्म या अल्ला!
ग़ज़ब का लुत्फ़ होता गुफ़्तगू मुझसे हुई होती।

फ़लक से चाँद तारे ला तेरा दामन सजा देता,
ये मुश्किल बात तू शादी से पहले गर कही होती।

सभी उश्शाक़ लेते आज मुझसे मश्‌वरा ‘ग़ाफ़िल’,
अगरचे शह्र में बदनाम अपनी आशिक़ी होती।

रविवार, जून 28, 2015

उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता

कभी टूटा हुआ तारा सितारा हो नहीं सकता।
उतर जाए जो नज़रों से वो न्यारा हो नहीं सकता।।

हमारे सिम्त अब आओगे तो हासिल न कुछ होगा,
हमारा चोट खाया दिल तुम्हारा हो नहीं सकता।

लगे रहते हैं रोज़ो-शब उगाते फ़स्ल ग़ज़लों की,
मगर अफ़सोस के इनसे गुज़ारा हो नहीं सकता।

ग़ज़ल में एक दो ही शे'र होते हैं सलीके के,
जो दिल को चूम ले वह ढेर सारा हो नहीं सकता।

चलें कू-ए-सुखन से दूर अब रोटी भी कुछ कर लें,
है सच के शेश्र जीने का सहारा हो नहीं सकता।

हमें सहरा में भी अब लुत्फ़ लेना आ गया ग़ाफ़िल,
चुनांचे ख़ुल्द भी हमको गवारा हो नहीं सकता।।

गुरुवार, जून 25, 2015

इक गीत तो लिख लूं मैं

कुछ वक़्त ठहर हमदम इक गीत तो लिख लूं मैं
इस वस्ल के लम्हे को मेरे मीत तो लिख लूं मैं
तन्हाई मेरी मुझको हर बार हरायी है
अब साथ तेरा पाकर मेरी जीत तो लिख लूं मैं

बुधवार, जून 24, 2015

मुझको तड़पाना ही था अगर ज़िन्दगी

मुझको तड़पाना ही था अगर ज़िन्दगी
काट देती तू मेरे ये पर ज़िन्दगी
तेरे कूचे में बेसुध भटकता रहा
और तुझको नहीं कुछ ख़बर ज़िन्दगी

सोमवार, जून 22, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया

1-
किया कुछ वक़्त ने मज़्बूर कुछ बंदिश ज़माने की,
हुई जाती है गश्तः उम्र यूँ अपने फ़साने की।
2-
हद से ज़्यादा बंदिशों के हम कभी क़ाइल नहीं,
आप आएं या न आएं ख़्वाब तो देखेंगे हम।
3-
नदी का ये उफान और टूटते जाना यूँ बन्धों का,
था अच्छा चश्म दो आपस में टकराए नहीं होते।
4-
सूख जाना ही तो था गुल का नसीब,
बाग़बाँ बदनाम बेमतलब हुआ।
5-
फिर मेरे क़त्ल की उम्मीद जगी है साहिब,
फिर मेरे चाहने वालों ने मुझे याद किया।
6-
तु जो मिल जाय तो इस पर मेरी भी राय हो क़ायम,
के सपने सुब्ह के अक्सर हक़ीक़त में बदलते हैं।
7-
तू ज़रा साफ़ तो कर आईना-ए-दिल अपना,
मेरा क़िरदार चमकता सा नज़र आएगा फिर।
8-
वे ही संभाल पाए न इक बेवफ़ा लक़ब,
माला जपा किए जो सुबो शाम इश्क़ की।
9-
फिर सँपोले को आस्तीं में पनाह?
जबके मालूम है वो क्या देगा!
10.
मैं क्या हूँ यह न पूछ और तू क्या है न बता,
बस मेरी हर इक सांस में ख़ुश्बू तेरी रहे।

बुधवार, जून 17, 2015

गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा

गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा
जिस तरह अपनी शा’इरी तन्‌हा
हो गया शाह पर सुकून नहीं
हो गयी जूँ कोई ख़ुशी तन्‌हा

सोमवार, मई 25, 2015

तुझको मुबारक हो

मुझे अच्छा लगे है मेरा ग़ैरतमंद बीराना
तेरा पत्थर का बेग़ैरत शहर तुझको मुबारक हो
मेरी तारीक रातें भी मुझे लोरी सुनाती हैं
कड़कती चिलचिलाती दोपहर तुझको मुबारक हो

-‘ग़ाफ़िल’

रविवार, मई 24, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : कभी मंज़िल कोई चलकर किसी के दर नहीं आती

1.
रहे पुरख़ार पर दौड़ा के मेरे आबलों के पा,
करम करते रहो और आबले मिटते रहें मेरे।
2.
मिटे हैं फ़ासिले तब क़ाइदन कोशिश हुई है जब,
कभी मंज़िल कोई चलकर किसी के दर नहीं आती।
3.
हाय अब तक न लगा मुझ पे भला क्‍यूँ इल्‍ज़ाम,
आपका भी जी सफ़ाई से चुरा लेने का।
4.
दे रहा मंज़िल का धोखा राह का हर इक पड़ाव,
ज़िन्दगी चलते ही रहने का बहाना है फ़क़त।
5.
ऐ तारों इस तरह सिरहाने उसके ग़ुल मचाते हो,
हमारे चाँद की जो नींद टूटी तो बुरा होगा।
6-
मुझे भाने लगीं तन्हाइयाँ कोई तो बतलाए,
के है आग़ाजे़ उल्‍फ़त या के है अंज़ामे उल्‍फ़त यह।
7-
आँखों से खेंच-खेंच पिलाती रही शराब,
कह-कहके यह के इसकी ख़ुमारी न जाएगी।

गुरुवार, मार्च 26, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : मेरा चेहरा ख़ामख़ा देखो गुलाबी कर दिया

1.
राह मंज़िल की अब्र से पूछें,
इससे बेहतर है के भटक जाएं।
2.
उम्र गिनिएगा तो मौसम बेमज़ा हो जाएगा,
देखते रहिए मिज़ाज औ लुत्फ़ जी भर लीजिए।
3.
आजकल तो आईना भी पार कर जाता है हद,
मेरा चेहरा ख़ामख़ा देखो गुलाबी कर दिया।
4.
कोई तद्‌बीर कर फिरसे मेरी पहचान वापिस हो,
तेरा ही नाम लेकर लोग मुझको याद करते हैं।
5.
मेरे महबूब का क्यूँ नाम मुझसे पूछते हो तुम,
सलीके से जो देखो आईना चेहरा दिखा देगा।
6.
ग़ैरों की बगिया के गुड़हल में भी क्या आकर्षण है जो,
अपने आगन का गुलाब भी लगता है फीका फीका सा।
7.
क़त्ल हो जाए न सच का फिर सफ़ाई से यहाँ
हाथ रख क़स्‍में उठीं फिर गीता-ओ-क़ुर्‌आन पर

मंगलवार, मार्च 24, 2015

क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ

स्वच्छ धवल आँचल लहराती,
नागिन के समान बलखाती,
कलकल कर बहती नदिया में,
कंकड़ एक मार कर मैं क्यूँ
खलनायक जग में कहलाऊँ,
क्यूँ ना मैं पादप बन जाऊँ।

शुक्रवार, फ़रवरी 20, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : आग़ाज़े बहार है

1.
जिगर के पार न कर खेंच कर मत मार ख़ंजर को,
तड़पता देखने के लुत्फ़ को ज़ाया नहीं करते।
2.
आँगन में अपने कैक्टस की झाड़ देखकर
ख़ुश हो रहे हैं ये के आग़ाज़े बहार है
3.
हिचकियां थम नहीं रहीं, शायद
मेरे क़ातिल ने याद फ़रमाया।
4.
ये गौहर काम आएँगे इन्हें ज़ाया नहीं करते,
ज़मीं से अश्क उठ फिर चश्म में आया नहीं करते।
5.
तुम्हारे दिल में हमारी जगह नहीं न सही,
तुम्हारे सामने की झोपड़ी हमारी है।
6.
तेरे आरिद पे तबस्सुम का रक्स करना और,
मेरे सीने में कोई सैफ़ उतरते जाना।
7-
तूने तोड़ा दिल को मेरे नाम तेरा ले सकता हूँ पर,
मैं यह चाहूँ मेरे होते तुझपे कोई इल्ज़ाम न आए।
8.
दिल मिरा टूटा हुआ है उसे ग़ुमान न था,
लूटने वाला लूट करके बहुत पछताया।
9.
मेरा चेहरा बिगाड़ कर मुझे दिखाता है,
एक अर्सा से आईने को संवारा जो नहीं।
10-
जब समझते हैं के कुछ सीखना बाक़ी न रहा,
कोई आ करके नया पाठ पढ़ा देता है।

शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2015

उसको तो पता यह भी न चला

उसको तो पता यह भी न चला
उसपे बहार कब छाई है।
कब कोमल कलियाँ चटक गयीं,
कब लाज की लाली धाई है।।

कब उसका वह भोला बचपन,
इस रंगमंच से विदा हुआ;
कब चंचल चितवन चुग़लायी,
कब लट उसकी लहराई है।

इक अन्जानी ख़ुश्बू से कब,
उसका तन उपवन महक उठा;
कब मन की कोयल कूक उठी,
कब गीत प्रणय के गाई है।

कब गति-गयंद गामिनी हुई,
कब मधुपूरितयामिनी हुई;
कब यौवन-भार दबी कुचली
कृश कटि उसकी बलखाई है।

ग़ाफ़िल! इन शोख़ अदाओं का,
कब से दीवाना बन बैठा;
जब भी ये कलियाँ फूल बनीं,
अलियों की शामत आई है।।

मंगलवार, फ़रवरी 03, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : वस्ल की रूह थरथराती है

1.
वक़्त के ताबे आफ़्ताबी निभाई हँसके,
वर्ना ग़ाफ़िल तो चाँदनी से भी जला अक्सर।
2.
आज बरसात हो रही जमकर जल रहा दिल का यह नगर फिर भी,
है सरे राह कोहे दुश्वारी गुज़र रही है पर उमर फिर भी।
3.
ऐ ग़ाफ़िल इश्क़ से उकता गये सब,
गोया के हाशिए पर आ गये सब।
4.
तू जो दूर हो तो भी होश गुम, तू जो पास है तो भी होश गुम,
ऐ शराब सी मेरी ज़िन्दगी तेरे साथ कैसे सफ़र करूँ?
5.
हिज़्र ने इस क़दर सताया के
वस्ल की रूह थरथराती है।
6.
जो तलाशोगे तो दिल में ही ख़ुद के पाओगे,
ये हम उश्शाक़ सरे राह नहीं मिलते हैं।
7.
वफ़ादारी निभाने में ही करता उम्र क्यूँ गश्ता,
जफ़ाओं की जो ऐसी यादगारी का पता होता।
8.
अपनों ने जनाज़े को तो रुख़्सत था कर दिया,
पल भर को सही रोक लिया राह का पत्थर।
9.
जिसने मेरे जिगर को किया था लहूलुहान,
आती है याद फिर वो तेरी सैफ़-ए-नज़र।
10.
फ़र्क़ क्या पड़ता है कोई ख़ुश है के नाराज़ है,
है यही क्या कम के अब भी चल रहा है सिलसिला।

सोमवार, फ़रवरी 02, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : अपना रस्ता भूल गया

1.
ख़िज़ाँ की कैफ़ियत बेहतर बहारें फिर भी आती हैं,
मगर उजड़े हुए गुलशन में फिर क्यूँकर बहार आए।
2.
अलसाई सी आँखों और अंगड़ाई लेती बाहों को क्या,
के एक मुसाफ़िर देख नज़ारा अपना रस्ता भूल गया।
3.
क्या तबस्सुम था उनके लब पे जब मैं रोया था,
आज सरका के कफ़न मेरा वे बहुत रोए।
4.
इक़रार और इन्कार का पहरा भी तो बालुत्फ़ है,
हुस्न के ज़िन्दाँ से ग़ाफ़िल हो रिहा भी किस तरह।
5.
कोई मेरी निगाहों से ज़रा दुनिया को तो देखे,
ये दुनिया जल रही होगी वो ग़ाफ़िल हो रहा होगा।
6-
बेशक ही ज़िन्दगी में लुत्फ़ बे-हिसाब हैं,
तूफ़ान में साहिल के मिस्ल घिर तो जाइए।
7.
कितना भी जानो मगर ख़ाक ही जानोगे मियाँ,
लाख सर मार लो ग़फ़लत ही नज़र आएगी।
8.
दिल में ही तो रक्खा था बड़े एहतियात से,
ग़फ़लत में दर-ब-दर मैं तुझे खोजता रहा।
9.
फ़र्क़ मग़रूर और मजबूर में बस यह ग़ाफ़िल,
इक सरेआम तो इक छुपके नुमा होते हैं।
10.
गुल को तो ख़ुश्बू-ए-ख़ुद तक का भी एहसास कहाँ,
जो के भौंरे की तड़प का मुलाहज़ा कर ले।

रविवार, फ़रवरी 01, 2015

मेरी जान मैंने देखा है

तेरी आँखों में इक तूफ़ान मैंने देखा है
फिर मेरी मौत का सामान मैंने देखा है
रक्स करता हुआ शोला कोई तबस्सुम सा
तेरे होंठों पे मेरी जान मैंने देखा है

-‘ग़ाफ़िल’

कुछ अलाहदा शे’र : ज़ुरूरी तो नहीं

1.
खो गयी मेरी ग़ज़ल गेसुओं के जंगल में,
जा रहा ढूढने लौटूं भी ज़ुरूरी तो नहीं।
2.
जाने ग़ज़ल करिश्मा है या भरम हमारा के तेरी,
सुह्बत में गेसू का जंगल निखरा सुथरा लगता है।
3.
है अभी शाम ढली जाम भी ढल जाने दे,
होश आएगा तो मैं भी उदास हो लूंगा।
4.
आज तो पूरा ख़ुम कर मेरे हवाले साक़ी,
कौन कमबख़्त आज होश में आना चाहे।
5.
उफ़ मेरी मज्बूरियाँ के लोग दीवाना कहें,
तेरी उल्फ़त के सिवा अब और तो चारा नहीं।
6.
ऐ ग़ाफ़िल दिल की सल्तनत अपनी,
हारकर देख फिर सिकन्दर तू।
7.
हो चुकी इब्तिदा-ए-शब चलो सपने सजाएँ कुछ,
सहर आएगी ग़ाफ़िल फिर नयी पेचीदगी लेकर।
8.
भले ग़ाफ़िल हूँ पर तेरी ही बग़िया का परिन्दा हूँ,
निगाहे शोख़ पर तेरी मेरा भी हक़ बराबर है।
9.
अगर सुर्ख़ लब ना नमूदार होते हमें याद शोलों की आई न होती,
न गुस्ताख़ होतीं निगाहें हमारी हवा गरचे घँघट उढाई न होती।
10.
नाम ले करके भला क्यों करें रुस्वा उसको,
जिसने भेजा सलाम उसको शुक्रिया अपना।

शनिवार, जनवरी 31, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : ख़ाली लिफ़ाफ़ा

1.
डूब तो जाऊँगा हरगिज़ है शर्त इतनी के,
मैं जहां हूँ वहां आँखों का समन्दर आए।
2.
उसमें इज़हारे मुहब्बत का असर तो कर दे,
ऐ ख़ुदा भेज दिया ख़ाली लिफ़ाफ़ा उसको।
3.
कह रही मैम यूँ लहराके दुपट्टा अपना,
देख ग़ाफ़िल ये कायनात हमारी ही है।
4.
दिल का तेरे दरवाज़ा बन्द रहता बारहा,
अब तो तुझे आवाज़ लगाते भी जी डरे।
5.
आँसुओं जो बहे जा रहे इस क़दर,
चश्म मेरी तुम्हें भी गवारा न क्या।
6.
मेरे पास खोने के सिलसिले तेरे पास पाने की चाहतें,
इन्हीं सिलसिलों इन्हीं चाहतों में गुज़र रही है दो ज़िन्दगी।
7.
तेरे आने का हमें इंतज़ार रहता है,
टूट जाता है दिल जाने की बात से तेरे।
8.
हम आए और उसने भी क्या उठके चल दिया,
बस इस अदा से हमसे मिली ज़िन्दगी अक्सर।
9.
फिर खिला है गुल तो फिर से ख़ुश्बुओं का काफ़िला
मेरे उदास वक़्त को ज़रा छुआ गुज़र गया
10.
काश के ग़ाफ़िल तेरे तसव्वुर में कोई खो जाता यूँ के,
अहले ज़माना फिर कह उठता इश्क़ दीवाना होता है।

शुक्रवार, जनवरी 30, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : उनकी नाराज़गी तो काम आए

1.
मनाने के श’ऊर को मेरे,
उनकी नाराज़गी तो काम आए।
2.
अँधेरी रात में ही दीप जले तो अच्छा,
कोई भूला जो याद आए तो ग़ज़ल होती है।
3.
आज हूँ क़ब्र में तो आई फ़ातिहा पढ़ने,
पहले घर पे ही आ जाती तो तेरा क्या जाता।
4.
ये ज़ुबान की मेरी तल्ख़ियाँ जो रुला गयीं तुझे बेतरह,
किसी रोज़ ख़ुश हालात में याद आएंगी फिर रुलाएंगी।
5.
हमारा बोलना तुझको कभी भी रास ना आया,
हमारी बेज़ुबानी रास आ जाए तुझे शायद।
6.
असमंजस में है ग़ाफ़िल के कौन शराब मुनासिब है,
साक़ी के हाथों की या फिर साक़ी के आँखों वाली।
7.
मैं क्या जानूं सोते-सोते स्वप्न में उसने क्या देखा,
देख मैं उसको स्वप्न देखते अपना सपना भूल गया।
8.
है दिलख़राश सनम देखकर मुझको अक्सर,
दस्त से यकबयक यूँ चाँद छुपाना तेरा।
9.
क़त्ल किया जो तूने हमारा मत कर उसका रंजो-मलाल,
अपने क़ातिल को हम ग़ाफ़िल लाख दुआएं देते हैं।
10.
हक़ीक़त दरहक़ीक़त देखता जाता है यह ग़ाफ़िल,
मगर चुप है बियाबाँ में कोई तूफ़ान आने तक।

गुरुवार, जनवरी 29, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : उसको फिर मुझमें लुत्फ़ है शायद

1.
कोई सूरत न दिखे अपनी रिहाई की अब,
क़ैद करके हमें पलकें वो उठाती ही नहीं।
2.
क्या रंग था रुत्बा था हम भी बादशाह थे,
होश आया तो जाना के मय की अहमियत है क्या।
3.
पीने के मेरे शौक़ का रुत्बा बना रहे,
क़ातिल ज़रा डुबो लियो ख़ंजर शराब में।
4.
मेरा मातम ही सही थोड़ी तो रौनक़ आए,
यूँ भी अर्सा से यहां कुछ तो मनाया न गया।
5.
हमारी क़ब्र को क़ब्रों के झुरमुट से अलहदा कर,
के उसके हाथ का गुल फिर बग़ल की क़ब्र पर देखा।
6.
उसने फिर मुझसे अदावत की है,
उसको फिर मुझमें लुत्फ़ है शायद।
7.
ऐ हवा क्या बिगड़ जाता तेरा इतना जो कर देती,
उड़ाया था दुपट्टा जो हमारे छत पे धर देती।
8.
क़ब्रदोज़ तमन्नाएं भड़कती ज़ुरूर हैं,
मौका भी है दस्तूर भी फ़र्मा ही दीजिए।
9.
नहीं है देखना तुमको मेरी जानिब तो ना देखो,
मगर यह बात क्या के तुम मेरी आँखों में रहते हो।
10.
अजब ही फ़ित्रतों से लैस है इंसान भी ग़ाफ़िल,
पहुँच कर क़ब्र में भी ख़्वाब देखे तन्दुरुस्ती का।

बुधवार, जनवरी 28, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : हमारे पास बहुत धोखे हैं

1.
चाँद भी अब्र के पीछे से इस तरह झांके,
जैसे घूँघट से निहारे मुझे चेहरा तेरा।
2.
उनका बनने में मुझे दो पल से ज़्यादा ना लगा,
बस उन्हें अपना बनाने में उमर जाती रही।
3.
न हो जो हिम्मते-दीदारे-हक़ीक़त ‘ग़ाफ़िल’,
ख़्वाब ही कोई इक हसीन सजाकर देखो।
4.
यह शब भी जा रही है अब तो चला दे ख़ंजर,
मुझे मारने से पहले तुझे नींद आ न जाए।
5.
तेरी दहलीज़ से होकर गुज़रता था जो इक रस्ता,
ऐ ग़ाफ़िल क्या हुआ के आजकल वह भी नदारद है।
6.
हमारे पास बहुत धोखे हैं,
कोई चाहे एकाध ले जाए।
7.
अक्स उसका उभर रहा हर सू,
अब मुझे नींद आ रही शायद।
8.
क़लम की नोक पर तेरी मैं आ गया क्या कम,
भले न सद्र इबारत में हाशिए पे सही।
9.
मुझे करना मुआफ़ अल्ला अगर गुस्ताख़ हो जाऊँ,
बड़ी नाज़ो अदा के साथ वो महफ़िल में आए हैं।
10.
हो रहा नज़्रे-आतिश दिल का घर भरे सावन,
कोई आ करके अब नज़रों के क़हर को रोके।

मंगलवार, जनवरी 27, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : बस पिघल जाओ ज़रा सा

1.
वही ख़ुदगर्ज़ जो ठुकरा के मुझको चल दिया था कल,
न जाने क्या क़यामत है के शब भर याद आया है।
2.
याद में कब तलक आते हैं वे देखो ग़ाफ़िल,
हम भी अब जिनको भुलाने की चाह रखते हैं।
3.
ख़ुद को अब मोम बताने से भला क्या हासिल,
बस पिघल जाओ ज़रा सा तो कोई बात बने।
4.
तक़ाज़ा मंज़िलों का हो भी तो क्यूँ करके हो यारों,
मेरी आवारगी बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल न समझो।
5.
अश्क से लिक्खी इबारत को मिटाता क्यूँ है,
तुझको आना तो न था चश्म में आता क्यूँ है।
6.
पूछे वह आखि़री ख़्वाहिश मुझसे,
ऐसे जैसे के अब भी ज़िन्दा हूँ।
7.
मेरी रूह जा चुकी है अब जिस्म को तो छोड़ो,
बेकार ही क्यूँ खूँ में सब हाथ डुबोते हो।
8.
लिखता हूँ मिटा देता हूँ अक्सर तुम्हारा नाम,
ताके तुझे पता न चले मेरी बेबसी।
9.
बड़ी आला रईसी में गुज़रती जा रही अपनी,
फ़ुर्क़तो रंजोग़म की सल्तनत पर कब से क़ाबिज़ हूँ।
10.
ख़ुदा से इल्तिजा है बात फिर बिगड़े न बन जाए,
दो टूटे दिल के जुड़ने का चला है सिलसिला ग़ाफ़िल।

रविवार, जनवरी 25, 2015

कुछ अलाहदा शे’र : जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं

1.
चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की,
इक झांकता गुलाब तुम्हारी किताब से।
2.
बारहा हो रहा ख़ूँगर मगर फिर भी क़शिश यह के,
तुम्हारे दर पे आ-आकर मैं अपना सर पटकता हूँ।
3.
जिस रोज़ मेरा होश भी मुझसे ख़फ़ा रहे,
उस रोज़ भी यादों का तेरे सिलसिला रहे।
4.
रात का ख़्वाब सहर को ही सुना दूँ जो कहो,
बेवफ़ा शाम तक यादों में रहे के न रहे।
5.
बारहा साबिक़ा रहता है अपना इस बहर से पर,
है जाना आज मैंने के ग़ज़ल यूँ मुस्कुराती है।
6.
फिर मेरी सरकार ने मुझ पर लगाई तोहमतें,
फिर है मेरे हाथ आया ज़हर का प्याला अभी।
7.
ख़ुदा करे के कभी शामे-वस्ल ना आए,
उसकी उम्मीद में ही ज़िन्दगी गुज़र जाए।
8.
इक दफ़ा रू-ब-रू हो जा तू ऐसी भी तमन्ना है,
तसव्वुर में तेरी तशरीफ़ गोया कम नहीं ग़ाफ़िल।
9.
वफ़ा की जुस्तजू में दर-ब-दर का भटकना भी क्या,
जफ़ाएँ भी इरादों को बहुत मज़्बूत करती हैं।
10.
क्या क़यामत है के आरिज़ उनके नीले पड़ गए
मैंने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तश्वीर का

रविवार, जनवरी 04, 2015

जो आस-पास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक

हैं जो बेहोश उन्हें होश भी आ जाएगा
जो बदहवास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक
दूर हूँ तुझसे तो हूँ तीरे-नज़र से महफ़ूज़
जो आस-पास हैं उनका तो बस ख़ुदा मालिक

-‘ग़ाफ़िल’

शुक्रवार, जनवरी 02, 2015

लोग इतना क़रीब रहकर भी दूरियां कैसे बना लेते हैं

लोग इतना क़रीब रहकर भी,
दूरियां कैसे बना लेते हैं।
बात करना तो बड़ी बात हुई,
देखकर आँख चुरा लेते हैं।

फ़ासिला तीन और पाँच का मिटे कैसे,
चार दीवार खड़ी बीच से हटे कैसे,
मेरी नाकामयाब कोशिश पे,
लोग हँसते हैं, मज़ा लेते हैं।

मैं वफ़ा करता रहा उनकी बेवफ़ाई से,
वो जफ़ा करते रहे हैं मेरी वफ़ाई से,
नग़्में ये सब वफ़ा-जफ़ाई के,
किसको कब कैसा सिला देते हैं।

उम्र ‘ग़ाफ़िल’ तेरी उनको ही मनाने में गई,
उनकी भी एक उमर तुझको सताने में गई,
छोड़ ये फ़ालतू क़वायद है,
और अफसाना सजा लेते हैं।।

-‘ग़ाफ़िल’